ग़ज़ल 

ऐ मेरे ‘मेहबूब’ मुझे सिर्फ इतना बताते जाना,
क्या? फिर होगा तेरा मेरी ‘गलियों’ में आना।
तकता रहूँगा राह मिट नहीं सकती तेरी चाह,
मिलने के मिला करेंगे अवसर भरता हूँ आह।
कभी तो आएगी ‘मेरी याद’ कभी पड़ेंगे पाँव,
जब बैठेंगे हम साथ पड़ेगी धूप मिलेगी छांव।
जुल्फों को लहराकर आना ‘दूर’ हमें हैं जाना,
मुझे देखना है तुम्हें बस होले-होले मुस्कुराना।
अब कभी पलकें उठाकर कहीं छुप न जाना,
सर उठाकर आना देखें चाहे ज़ालिम जमाना।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)

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