” बे– शुमार आदमी “

हर  तरफ  हर  जगह  बे– शुमार  आदमी  ,

फिर  भी  तन्हाइयों  का  शिकार  आदमी  !

सुबह  से  शाम  तक  बोझ   ढोता   हुआ  ,

अपनी  ही  लाश  का  ख़ुद  मज़ार  आदमी  !

हर  तरफ  भागते    दौड़ते     रास्ते   ,

हर  तरफ  आदमी  का  शिकार    आदमी   !

रोज़  जीता  हुआ  रोज़   मरता   हुआ   ,

हर  नये  दिन  नया  इंतज़ार   आदमी   !

घर  की  दहलीज  से  गेंहू  के  खेत  तक  ,

चलता  फिरता  कोई  कारोबार    आदमी   !

ज़िंदगी  का  मुक़द्दर  सफ़र– दर — सफ़र

आखिरी  साँस     तक  बेक़रार      आदमी   !

——  निदा  फाजली

( संकलित   )

 

———-  राम  कुमार  दीक्षित  ,   पत्रकार   !

 

 

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