” कोई आदमी न मिला “

मोहब्बतों  में  दिखावे  की  दोस्ती  न  मिला  ,

अगर  गले  नहीं  मिला  तो  हाथ  भी  न  मिला   !

घरों  पे  नाम  थे, नामों  के  साथ  ओहदे  थे  ,

बहुत  तलाश  किया  कोई  आदमी  न  मिला   !

तमाम  रिश्तों  को  मैं  घर  पे  छोड़  आया  था  ,

फिर  उसके  बाद  मुझे  कोई  अजनबी  न  मिला   !

खुदा  की  इतनी  बड़ी  कायनात  में    मैंने   ,

बस  एक  शख्स  को  माँगा  मुझे  वही  न  मिला   !

बहुत     अजीब  है  ये  कुर्बतों  की  दूरी    भी    ,

वो  मेरे  साथ  रहा  और  मुझे   कभी  न   मिला    !

( संकलित   )

 

——–  राम कुमार  दीक्षित  ,  पत्रकार   !

 

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