” गुरु की आखिरी चाल “

एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में एक महान तलवारबाज़ गुरु रहते थे। उनकी तलवार की धार जितनी तेज़ थी, उतनी ही गहरी उनकी बुद्धि भी थी। दूर-दूर से लोग उनके पास युद्ध-कला सीखने आते थे। उन्हीं शिष्यों में एक युवक था, जो अत्यंत प्रतिभाशाली था। गुरु ने उसे पुत्र समान स्नेह दिया और तलवारबाज़ी की हर विद्या सिखा दी। वर्षों की मेहनत के बाद वह शिष्य इतना कुशल हो गया कि लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। धीरे-धीरे प्रशंसा ने उसके मन में अहंकार भर दिया।

अब वह गांव-गांव घूमकर कहने लगा, “मेरे जैसा तलवारबाज़ कोई नहीं। मेरा गुरु बूढ़ा हो चुका है, अब वह मुझे नहीं हरा सकता।” शुरुआत में लोगों ने उसकी बातों को मज़ाक समझा, लेकिन उसका घमंड दिन-ब-दिन बढ़ता गया। आखिर एक दिन उसने पूरे गांव के सामने अपने गुरु को चुनौती दे दी—“यदि आपमें सामर्थ्य है तो मैदान में आकर मुझसे मुकाबला कीजिए, अन्यथा गुरु कहलाने का अधिकार छोड़ दीजिए।”

गांव वालों को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। सभी ने शिष्य को समझाया कि गुरु का अपमान करना पाप है, परंतु अहंकार में डूबा शिष्य किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। वृद्ध गुरु शांत रहे। उन्होंने चुनौती स्वीकार कर ली।

मुकाबले की तारीख तय हुई। पूरे गांव में उत्सुकता फैल गई। सभी को लग रहा था कि बूढ़े गुरु अब युवा शिष्य के सामने टिक नहीं पाएंगे। लेकिन मुकाबले से एक दिन पहले शिष्य ने एक अजीब बात देखी। गुरु एक लोहार से पंद्रह फीट लंबी म्यान बनवा रहे थे। शिष्य चौंक गया। उसने सोचा, “निश्चित ही गुरु ने कोई गुप्त विद्या छिपा रखी है। इतनी लंबी म्यान का मतलब है कि तलवार भी उतनी ही लंबी होगी।”

डर और अहंकार के मिश्रण में उसने तुरंत दूसरे लोहार से सोलह फीट लंबी तलवार और म्यान बनवा ली। वह मन ही मन खुश था कि जैसे ही गुरु अपनी तलवार निकालेंगे, वह उनसे पहले हमला कर देगा।

अगले दिन मैदान लोगों से खचाखच भरा था। गुरु के हाथ में पंद्रह फीट लंबी म्यान थी और शिष्य के हाथ में उससे भी लंबी। सीटी बजते ही मुकाबला शुरू हुआ।

क्षणभर में गुरु ने अपनी लंबी म्यान से बिजली जैसी फुर्ती से छोटी सी तलवार बाहर निकाली और सीधे शिष्य की गर्दन पर रख दी। उधर शिष्य अपनी भारी और लंबी तलवार म्यान से पूरी निकाल भी नहीं पाया था। पूरा मैदान स्तब्ध रह गया।

शिष्य का चेहरा शर्म से झुक गया। उसे समझ आ गया कि गुरु ने केवल म्यान लंबी बनवाई थी, तलवार नहीं। जबकि उसने बिना सोचे-समझे तलवार और म्यान दोनों लंबी बनवा लीं। गुरु मुस्कुराए और बोले, “युद्ध केवल ताकत से नहीं, बुद्धि और धैर्य से जीता जाता है। और गुरु का अनुभव कभी बूढ़ा नहीं होता।”

शिष्य की आंखों से अहंकार उतर चुका था। वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा। गुरु ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

 

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के बाद भी यदि व्यक्ति विनम्र नहीं रहता, तो उसका पतन निश्चित है। गुरु का अनुभव, बुद्धि और जीवन की समझ कभी व्यर्थ नहीं जाती, इसलिए गुरु का हमेशा सम्मान करना चाहिए। केवल बाहरी ताकत या दिखावा सफलता नहीं दिलाता, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने की बुद्धिमानी ही वास्तविक विजय दिलाती है। जो व्यक्ति अपने गुरु, बड़ों और मार्गदर्शकों का आदर करता है, वही जीवन में सच्चा ज्ञान, सम्मान और सफलता प्राप्त करता है !

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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