मूच्छंन का कीन्हे सफाचट्ट , मुँह पौडर औ सिर केश बड़े
तहमद पहिरे कंबल ओढ़े , बाबू जी याकै रहैं खड़े
हम कहा मेम साहेब सलाम , उई बोले चुप बे डेम फूल
मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ हम कहा बड़ा ध्वाखा होईगा
धंसी गयन दुकानै दीख जहाँ , मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी
मुहु पौडर पोते उजर उजर , औ पहिरे सारी सुघर बड़ी
हम जाना मूरति माटी कै, सो सारी पर जब हाथ धरा !
उई झझकि भकुरि खाऊख्वाय उठीं, हम कहा फिरिव्
ध्वाखा होईगा !
—— प्रसिद्ध हास्य कवि रमई काका
( संकलित )
—— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !
