” ज़मी छोड़कर मैं किधर जाऊँगा ? “

ज़मी  छोड़कर  मैं  किधर  जाऊँगा

अंधेरों  के  अन्दर  उतर  जाऊँगा   !

 

गिरी  पत्तियाँ  सारी  सुखी  हुई

नये  मौसमों  में  बिखर  जाऊँगा   !

 

अगर  आ  गया  आईना  सामने

तो  अपने  ही  चेहरे  से  डर  जाऊँगा  !

 

वो  इक  आँख  जो  मेरी  अपनी  भी  है

न  आई  नज़र  तो  किधर  जाऊँगा    !

 

वो  इक  शख्स  आवाज़  देगा  अगर  ,

मैं  खाली  सड़क  पर  ठहर  जाऊँगा  !

 

पलट  कर  न  पाया  किसी  को  अगर

तो  अपनी  ही  आहट  से  डर  जाऊँगा  !

 

तिरी  जात  में  साँस  ली  है  सदा  ,

तुझे  छोड़कर  मैं  किधर  जाऊँगा   !

( संकलित  )

 

—–  राम कुमार दीक्षित, पत्रकार  !

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