” दीप अभी जलने दे भाई “

निद्रा की मादक मदिरा पी,

सुख स्वप्नों में बहलाकर जी,

रात्रि– गोद में जग सोया है, पलक न मेरी लग पाई,

दीप अभी जलने दे भाई !

आज पड़ा हूँ बनकर शव ,

जीवन में जड़ता का अनुभव ,

किसी प्रतीक्षा की स्मृति से ये पागल आँखें पथराईं !

दीप अभी जलने दे भाई !

दीप शिखा में झिल- मिल, झिल– मिल,

प्रति पल धीमे– धीमे हिल– हिल ,

जीवन का आभास दिलाती कुछ मेरी तेरी परछाईं !

दीप अभी जलने दे भाई !

—- प्रसिद्ध कवि हरिबंश राय बच्चन

( संकलित )

—- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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