अपना लो इस बार !
अबकी मत लौटो , बस जाओ ,
उर पर कर अधिकार !
बिना तुम्हारे बीते दिन जो
फिर से नहीं मांगता उनको !
मिले खाक मे वे सब ,
जागूं तुम्हारी जगमग द्युति में
जीवन सतत पसार !
क्या धुन कौन बात पर जानें
जहाँ तहाँ भटका अनजाने ,
घाट बाट में कितने ,
अब वह मुख रख पास हृदय के
अपनी कहो पुकार !
कितने दाग दगा चालाकी
अब भी पड़े हुए हैं बाकी ,
इस कसूर पर लौटा मत दो
उन्हें बना दो छार !!
—– प्रसिद्ध कवि रवींद्रनाथ टैगोर
( संकलित )
—- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

