शायद एक खुशी द्वारे से लौट गई है ,
प्यास अनकही चौबारे से लौट गई है !
खलल नींद में डाल नहीं तू घर को जा रे,
कहकर नदिया मछुआरे से लौट गई है !
एक किरण धुंधली सी आई तो थी शायद ,
डरकर वह भी अंधियारे से लौट गई है !
सबकी प्यास बुझाती हूँ आकार न देखो ,
कह नदिया सागर खारे से लौट गई है !
अब तू पाँव पसार मुझे कर रुखसत फिर से ,
कहकर संध्या भिनसारे से लौट गई है !
( संकलित )
—– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
