बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ !
जो बनि आवे सहज में , ताही में चित देइ !
ताही में चित देइ , बात जोई बनि आवे !
दुर्जन हंसे न कोइ , चित्त में खता न पावे !
कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती !
आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती !
—– गिरिधर कविराय
( संकलित )
—- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
