“अरमान बहुत हैं “

खुशियाँ कम और अरमान बहुत हैं ,

जिसे भी देखो परेशान बहुत है !

करीब से देखा तो निकला रेत का घर ,

मगर दूर से इसकी शान बहुत है !

कहते हैं सच का कोई मुकाबला नहीं ,

मगर आज झूठ की पहचान बहुत है !

मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी ,

यूँ तो कहने को इनसान बहुत है !

( संकलित )

—- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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