जीवन से छुटे छुटे
ऊपर से सटे सटे
अन्दर से हटे हटे
कुछ ऐसे भी यह दुनिया जानी जाती है !
अपनी ही रची सृष्टि
अपनी ही ब्रह्म दृष्टि
ऊपर से रचे रचे
अन्दर से बचे बचे
कुछ ऐसे भी दुनिया पहचानी जाती है !
स्वयं बिना नपे तुले
कण् कण् से मिले जुले
उपर से ठगे ठगे
अन्दर से जगे जगे
कुछ ऐसे भी दुनिया अनुमानी जाती है !
( संकलित )
—- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

