” ये नगर कैसा है “

लोग कैसे हैं यहाँ के, ये नगर कैसा है ?

उनकी जादू भरी बातों में असर कैसा है ?

डूबने वाले को बाहर तो निकल आने दो ,

बाद में पूंछते रहना कि भंवर कैसा है ?

क्या बात पाएंगे ये फुटपाथ पे सोने वाले ,

कोई पूंछे भी अगर उनसे कि घर कैसा है ?

आँधियाँ रुकते ही देखेंगे चमन में जाकर ,

जिसकी कमज़ोर जड़ें थी वो शजर कैसा है ?

चाँद से चेहरे पे कल जिसके खराश आई थी ,

माना दुश्मन था , बताओ तो मगर कैसा है ?

( संकलित )

—– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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