जालिम था वो घना अंधेरा
जिसने मेरा आंगन घेरा
बनते — बनते फिर से बिखरा
तेरे द्वारे का पगफेरा
शायद कोई फेंक रहा है
तुझ पर, मुझ पर जादू — टोना
चंदा रे ! गुस्सा मत होना !
अब तुझसे क्या राज़ छिपाऊँ
तुझसे ही चांदनी कहाऊँ
सूरज बुझता हो बुझ जाए
तेरे छिपने से घबराऊँ ,
तुझसे , मुझसे ही रोशन है
धरा– सेज का कोना– कोना ,
चंदा रे ! गुस्सा मत होना !
—— प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास
( संकलित )
—– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

