” हवा गुज़र गयी पत्ते थे कुछ हिले भी नहीं “

हवा गुज़र गयी पत्ते थे कुछ हिले भी नहीं ,

वो मेरे शहर में आये भी और मिले भी नही !

ये कैसा रिश्ता हुआ इश्क़ में वफ़ा का भला,

तमाम उम्र में दो चार छः गिले भी नहीं !

इस उम्र में भी कोई अच्छा लगता है लेकिन ,

दुआ– सलाम के मासूम सिलसिले भी नहीं !

—– प्रसिद्ध गीतकार गुलज़ार

( संकलित )

—- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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