” हम नदी के साथ — साथ “

हम नदी के साथ — साथ

सागर की ओर गए

पर नदी सागर में मिली

हम छोर रहे ,

नारियल के खड़े तने हमेँ

लहरों से अलगाते रहे

बालू के दूहों से जहाँ– तहाँ चिपटे

रंग– बिरंग तृण– फूल– शूल

हमारा मन उलझाते रहे

नदी की नाव

न जाने कब खुल गई

नदी ही सागर में घुल गई

हमारी ही गाँठ न खुली

दीठ न धुली

हम फिर लौटकर फिर गली– गली

अपनी पुरानी अस्ति की टोह में भरमाते रहे !!

—– प्रसिद्ध कवि अज्ञेय

( संकलित )

—– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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