ज़िंदगी के लिए इक खास सलीका रखना
अपनी उम्मीद को हर हाल में जिंदा रखना !
उसने हर बार अंधेरे में जलाया ख़ुद को
उसकी आदत थी सरेराह उजाला रखना !
बंद कमरे में बदल जाओगे इक दिन लोगो
मेरी मानो तो खुला कोई दरीचा रखना !
क्या पता राख में ज़िंदा हो कोई चिंगारी
जल्दबाज़ी में कभी पाँव न अपना रखना !
वक़्त अच्छा हो तो बन जाते हैं साथी लेकिन
वक़्त मुश्किल हो तो बस ख़ुद पे भरोसा रखना !!
—- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !
