मैं तुफ़ानों में चलने का आदि हूँ ,
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
हैं फूल रोकते , कांटे मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते ..
सच कहता हूँ जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने में भी शर्माते…
मेरे संग चलने लगें हवाएं जिससे…
तुम पथ के कण् — कण् को तूफान करो !
मैं तुफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूँ ..
मैं मर्घट से ज़िंदगी बुला के लाया हूँ …
हूँ आँख– मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार मृत्यु के गले चूम कर आया हूँ..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी…
तुम मत मुझ पर कोई एहसान करो …
मैं तुफ़ानों में चलने का आदी हूँ ..
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !!
——- प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज
( संकलित )
—– राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !
