” दो गाँवों की सीख “

राजस्थान के एक छोटे से गांव भानपुर में अर्जुन नाम का युवक रहता था। वह मेहनती तो था, लेकिन उसकी एक आदत बहुत खराब थी। वह हमेशा दूसरों की चीजों पर नजर रखता था। किसके पास कितना धन है, किसके खेत बड़े हैं, किसके घर में क्या सामान है — यही बातें उसके मन में घूमती रहती थीं।

उसी समय पास के गांव रामगढ़ में मोहन नाम का युवक रहता था। मोहन साधारण जीवन जीता था, लेकिन बहुत समझदार और संतुष्ट स्वभाव का था। वह हमेशा कहता था, “मनुष्य को पहले खुद को समझना चाहिए, तभी जीवन सफल बनता है।”

एक दिन दोनों गांवों के लोगों ने पास के बड़े मेले में जाने का निश्चय किया। संयोग से अर्जुन और मोहन की मुलाकात रास्ते में हो गई। दोनों साथ-साथ यात्रा करने लगे। रास्ता लंबा था, इसलिए बातचीत भी खूब होने लगी।

अर्जुन मन ही मन सोच रहा था कि मोहन बहुत शांत रहता है, जरूर उसके पास कोई कीमती चीज होगी। उसने तय किया कि वह मौका मिलते ही उसकी पोटली की तलाशी लेगा।

रात को जब दोनों किसी पेड़ के नीचे आराम करते, अर्जुन चोरी-छिपे मोहन की गठरी टटोलता। लेकिन हर बार उसे कुछ नहीं मिलता। सात दिनों तक यात्रा चलती रही और अर्जुन रोज यही कोशिश करता रहा। वह हैरान था कि इतना शांत और निश्चिंत आदमी आखिर खाली हाथ कैसे यात्रा कर सकता है।

सातवें दिन मेला समाप्त हुआ और दोनों को अपने-अपने गांव लौटना था। विदा लेते समय अर्जुन से रहा नहीं गया। उसने मुस्कुराकर कहा,
“भाई मोहन, सच बताना। क्या तुम्हारे पास कोई कीमती चीज नहीं थी? मैंने पूरी यात्रा में कई बार तुम्हारी पोटली देखी, लेकिन कुछ नहीं मिला।”

मोहन हल्के से हंसा और बोला,
“मित्र, मेरे पास एक चांदी का सिक्कों से भरा थैला और एक बहुमूल्य हीरा था।”

अर्जुन चौंक गया।
“फिर मुझे मिला क्यों नहीं?”

मोहन ने शांत स्वर में कहा,
“क्योंकि जब भी मैं बाहर जाता था, मैं वह थैला और हीरा तुम्हारी ही पोटली में रख देता था। तुम हमेशा मेरी गठरी टटोलते रहे, लेकिन कभी अपनी पोटली नहीं देखी।”

यह सुनकर अर्जुन शर्म से सिर झुका कर खड़ा रह गया। उसे अपनी गलती समझ आ गई। वह हमेशा दूसरों में कमी और संपत्ति खोजता रहा, लेकिन कभी अपने भीतर झांकने की कोशिश नहीं की।

मोहन ने जाते-जाते कहा,
“मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह दूसरों को परखने में जीवन लगा देता है और खुद को समझने का समय नहीं निकालता। जिस दिन इंसान अपनी कमियां पहचान लेता है, उसी दिन उसका जीवन बदल जाता है।”

उस दिन के बाद अर्जुन पूरी तरह बदल गया। उसने दूसरों से तुलना करना छोड़ दिया और अपने काम, अपने परिवार और अपने जीवन को बेहतर बनाने में लग गया। धीरे-धीरे वह अपने गांव का सबसे सम्मानित व्यक्ति बन गया।

 

दूसरों की कमियां खोजने से बेहतर है कि हम स्वयं को पहचानें।
जो अपने मन को संभाल लेता है, उसके जीवन में सुख और शांति स्वयं आ जाते हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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