” हरा वृक्ष सबको बराबर छाया देता है “

स्वामी विवेकानंद को युवा समाज से काफी आशा रहती थी  ! युवाओं के साथ वार्ता  , संवाद, गोष्ठी  आदि के लिए वे सदैव तत्पर रहते थे  ! युवा वर्ग में हताशा तथा अवसाद पर उनकी एक बार सार्थक चर्चा हो रही थी  !

एक युवक ने सवाल उठाया, माननीय, किसी धूर्त तथा नीच मानसिकता वाले आदमी से तो प्रेम का सवाल ही नहीं उठता  ! उसे तो दूध की मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंक देना चाहिए  !

यह सुनते ही स्वामी विवेकानंद सभी को एक बगीचे में ले गए और बताया  ! यह देखो  , यह हरे वृक्ष सबको बराबर छाया और शीतलता दे रहे हैं  ! मानव या अमानव इनको सबसे समान स्नेह है  ! बस ऐसे ही बनो  ! सबके साथ समान व्यवहार करो  ! यही सहजता दिव्यता तक ले जायेगी  ! किन्हीं भी परिस्थितियों में अपनी सहजता नहीं खोनी है  ! दूसरा क्या कर रहा है  , इस पर ध्यान नहीं देना है  ! मैं क्या कर रहा हूँ  ? इस पर  प्रतिपल ध्यान देना है  ! हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा  ! इस पर बराबर अमल करना है  ! सभी युवाओं ने स्वामी विवेकानंद जी के इन अमृत वचनों का आजीवन पालन करने का  व्रत   ले  लिया   !

 

———- राम  कुमार  दीक्षित, पत्रकार, पुणे  !