” जहाँ सद्भाव होगा, वहाँ विश्वास भी होगा “

एक सेठ अत्यंत धर्मात्मा थे  ! वह अपनी आय का बड़ा हिस्सा सेवा— परोपकार जैसे धार्मिक कार्यों में खर्च किया करते थे  ! कई पीढ़ियों से उनके परिवार पर माँ लक्ष्मी की असीम कृपा बनी हुई थी  ! एक बार देवी लक्ष्मी के मन में आया कि एक जगह रहते– रहते कई सौ वर्ष हो गए  ! ऐसे में, क्यों न इस परिवार को त्यागकर कहीं अन्यत्र जाया जाए  !

एक दिन सेठ से स्वप्न में लक्ष्मी जी ने कहा  , अब मैं तुम्हारे घर से जाना चाहती हूँ  ! चूंकि तुम सबने अपने प्रेमपाश में मुझे बांधे रखा है  , इसलिए जाते– जाते मैं तुम्हें कोई एक वरदान देना चाहती हूँ  ! तुम सोच– समझकर कोई वरदान माँग लो  ! सेठ ने अपने परिवार के सदस्यों को बुलाकर इस पर विचार– विमर्श किया  ! किसी ने माँ लक्ष्मी से असीमित धन माँगने को कहा तो किसी ने बहुमूल्य  हीरे– जवाहरात माँगने की इच्छा रखी

सेठ की वृद्धा माँ परम धर्मात्मा और संतोषी  थीं  ! उन्होंने कहा बेटा  , माँ लक्ष्मी से यह वरदान माँगो कि हमारे परिवार में सभी की सद्बुद्धि और सद्भावना हमेशा बनी रहे  ! सेठ ने यही वरदान माँ लक्ष्मी से माँग लिया  ! लक्ष्मी जी ने सुना तो बोलीं  ,  तुम बहुत चतुर हो  ! जहाँ सद्बुद्धि और प्रेम होगा  , वहाँ शील, सत्य और विश्वास को भी स्वतः रहना होगा  ! तुमने एक ही वरदान में सारा स्वर्ग माँग लिया है  ! ऐसे परिवार को छोड़कर भला मैं कैसे जा सकती हूँ  ! कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमारे जीवन में भी हमेशा सद्भाव और  विश्वास बना रहना चाहिए  !

 

———- राम कुमार दीक्षित  , पत्रकार  ,  पुणे  !