” कोई अर्थ नहीं “

नित  जीवन  के  संघर्षों  से   ,

जब  टूट  चुका  हो  अंतर  मन  !

तब  सुख  के  मिले  समंदर  का  ,

रह  जाता  कोई  अर्थ   नहीं  !

 

जब  फसल  सूख  कर  जल  के  बिन  ,

तिनका   तिनका बन   गिर   जाए   !

फिर  होने  वाली  वर्षा  का  ,

रह   जाता   कोई   अर्थ   नहीं   !

 

संबंध  कोई  भी   हो   लेकिन  ,

यदि   दुख  में  साथ  न  दे  अपना   !

फिर  सुख  के  उन  संबंधों  का  ,

रह  जाता  कोई   अर्थ   नहीं   !

 

छोटी   छोटी   खुशियों  के  क्षण  ,

निकले  जाते  हैं  रोज   जहाँ  !

फिर  सुख  की  नित्य  प्रतीक्षा  का  ,

रह  जाता   कोई   अर्थ   नहीं   !

 

मन  कटु   वाणी  से  आहत  हो  ,

भीतर  तक  छलनी  हो  जाये  !

फिर  बाद  कहे  प्रिय  वचनो  का  ,

रह  जाता  कोई   अर्थ   नहीं  !

 

सुख  साधन  चाहे  जितने  हों  ,

पर  काया  रोगों  का  घर   हो  !

फिर  उन अगनित  सुविधाओं  का  ,

रह  जाता   कोई   अर्थ   नहीं  !

———- प्रसिद्ध कवि  रामधारी सिंह  दिनकर

(  संकलित  )

————-  राम  कुमार  दीक्षित  ,  पत्रकार !