” रिश्तों का साथ “

एक दिन रमेश अपनी पत्नी के साथ घर की छत पर गया। उसकी पत्नी ने छत पर अनेक गमलों में छोटे-छोटे पौधे लगा रखे थे। कहीं गुलाब के फूल खिले थे, कहीं तुलसी लहरा रही थी तो कहीं नींबू और मिर्च के पौधों पर फल दिखाई दे रहे थे। छत का वह छोटा-सा बगीचा बहुत सुंदर लग रहा था।

रमेश ने देखा कि उसकी पत्नी एक गमले में लगे छोटे से पौधे को उठाकर दूसरे पौधे के पास रख रही थी।

उसने आश्चर्य से पूछा, “तुम इस पौधे को इधर से उधर क्यों कर रही हो? अगर यह मुरझा रहा है तो इसमें खाद डालो, पानी डालो। इसे दूसरे पौधे के पास रखने से क्या होगा?”

पत्नी मुस्कराई और बोली, “यह पौधा कई दिनों से अकेला पड़ा है। इसके आसपास कोई दूसरा पौधा नहीं है। मैंने देखा है कि जब पौधे एक-दूसरे के पास रहते हैं तो बगीचा भी सुंदर लगता है और उनकी देखभाल करना भी आसान हो जाता है।”

पत्नी की बात सुनकर रमेश हँस तो दिया, लेकिन उसके मन में एक विचार ने जन्म ले लिया।

उसे अपने पिता की याद आ गई। माँ के देहांत के बाद पिता बिल्कुल बदल गए थे। जो पिता कभी पूरे घर में हँसी-मजाक करते रहते थे, वे अब घंटों चुपचाप बैठे रहते थे। घर में सब कुछ था, लेकिन माँ के जाने के बाद उनके जीवन से जैसे खुशियाँ चली गई थीं।

रमेश को समझ आया कि मनुष्य को केवल भोजन, कपड़े और रहने के लिए घर ही नहीं चाहिए, उसे किसी अपने का साथ भी चाहिए।

उसे बचपन की एक घटना भी याद आई। एक बार वह मेले से एक छोटी-सी रंगीन मछली खरीदकर लाया था। उसने मछली को काँच के एक जार में रख दिया। उसके लिए भोजन भी डालता, पानी भी बदलता, लेकिन मछली धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई और एक दिन मर गई।

तब उसे लगता था कि शायद उसने उसकी देखभाल में कोई कमी छोड़ दी होगी। आज उसे एहसास हुआ कि जीव-जंतुओं के लिए भी उचित वातावरण और अपनी प्रजाति के साथ का महत्व होता है।

उस दिन रमेश ने अपनी पत्नी से कहा, “तुमने आज मुझे जीवन का बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया। हम अपने घरों को सजाने में तो बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन कभी-कभी अपने रिश्तों को सँवारना भूल जाते हैं।”

पत्नी ने मुस्कराकर कहा, “रिश्ते भी पौधों की तरह होते हैं। उन्हें समय, विश्वास, अपनापन और प्रेम की आवश्यकता होती है। यदि हम उनकी देखभाल नहीं करेंगे तो वे धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएँगे।”

उस दिन से रमेश ने अपने व्यवहार में बदलाव करना शुरू कर दिया। वह अपने पिता के साथ अधिक समय बिताने लगा। पुराने मित्रों से मिलने लगा और जिन रिश्तेदारों से वर्षों से बातचीत बंद थी, उनसे भी संपर्क करने लगा।

धीरे-धीरे उसके घर का वातावरण बदलने लगा। पिता के चेहरे पर फिर मुस्कान लौटने लगी और घर में हँसी की आवाजें सुनाई देने लगीं।

*कहानी से मिलने वाली पाँच अनमोल सीख*

1. *रिश्तों को समय दीजिए:* केवल धन और सुविधाएँ जीवन को सुंदर नहीं बनातीं, अपनों का साथ जीवन में खुशियाँ भरता है।

2. *अकेले लोगों का सहारा बनिए:* आपके कुछ प्रेम भरे शब्द किसी उदास व्यक्ति के जीवन में नई आशा जगा सकते हैं।

3. *बुजुर्गों को अपनापन दीजिए:* उन्हें महँगे उपहारों से अधिक आपके समय, बातचीत और सम्मान की आवश्यकता होती है।

4. *रिश्तों को सँभालकर रखिए:* छोटी-छोटी गलतफहमियों के कारण अपनों से दूर मत होइए। पहल करके बात कीजिए और क्षमा करना सीखिए।

5. *खुशियाँ बाँटना सीखिए:* जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति अच्छे रिश्ते और सच्चे साथी होते हैं।

याद रखिए, जिस प्रकार एक पौधे को हरा-भरा रहने के लिए उचित देखभाल की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी प्रेम, विश्वास और अपनेपन की आवश्यकता होती है।

कभी अपने आसपास देखिए, शायद कोई बुजुर्ग आपकी आवाज सुनने के लिए तरस रहा हो, कोई मित्र आपकी एक मुलाकात की प्रतीक्षा कर रहा हो या परिवार का कोई सदस्य आपसे दो पल बात करना चाहता हो।

किसी के जीवन में खुशियाँ लाने के लिए हमेशा धन की आवश्यकता नहीं होती। कभी एक फोन, एक मुस्कान, एक मुलाकात और प्रेम के दो शब्द ही पर्याप्त होते हैं।

*किसी को इतना अकेला मत छोड़िए कि वह लोगों के बीच रहकर भी अपनों को तलाशता रहे। रिश्ते बनाना आसान है, लेकिन उन्हें निभाना ही सच्ची इंसानियत है।*

🀠खुद भी मुस्कुराइए और किसी दूसरे के चेहरे की मुस्कान की वजह भी बनिए।

*राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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