” संघर्ष “

एक गाँव में एक मेहनती किसान रहता था। वह दिन-रात खेतों में पसीना बहाता और अपनी फसल को बच्चों की तरह प्यार करता था। लेकिन प्रकृति हर बार उसके धैर्य की परीक्षा लेती। कभी तेज बारिश से खेत डूब जाते, कभी सूखे के कारण फसल मुरझा जाती, कभी तेज धूप पौधों को जला देती और कभी ओलावृष्टि उसकी महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती।

एक दिन किसान बहुत दुखी होकर खेत की मेड़ पर बैठ गया। उसने आकाश की ओर देखकर कहा, “हे परमात्मा! आखिर आप मेरे साथ ऐसा क्यों करते हैं? यदि आपको खेती का इतना ही ज्ञान है तो एक बार मुझे मौका दीजिए। एक साल मौसम मेरी इच्छा के अनुसार रहने दीजिए। फिर देखिए, मैं इतनी शानदार फसल पैदा करूंगा कि अनाज के भंडार भर जाएंगे।”

परमात्मा मुस्कुराए और बोले, “ठीक है किसान! इस बार मौसम वैसा ही होगा जैसा तुम चाहोगे।”

किसान बहुत प्रसन्न हुआ। उसने गेहूँ बोया। जब उसे धूप की आवश्यकता होती, सूर्य की किरणें मिलतीं और जब पानी चाहिए होता, समय पर वर्षा हो जाती। किसान ने तेज आँधी, ओले और अत्यधिक गर्मी को आने ही नहीं दिया। फसल तेजी से बढ़ने लगी।

खेत को देखकर किसान का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। लहलहाते पौधों को देखकर वह मन ही मन कहने लगा, “अब परमात्मा को पता चलेगा कि खेती कैसे की जाती है। इतने वर्षों तक प्रकृति ने बेवजह मुझे परेशान किया।”

कुछ महीनों बाद फसल पककर तैयार हो गई। किसान हँसते हुए दरांती लेकर खेत में पहुँचा। उसने गेहूँ की एक बाली तोड़ी और उसे हाथ में रगड़ा। लेकिन यह क्या?

बाली के अंदर एक भी दाना नहीं था!

उसने दूसरी बाली तोड़ी, वह भी खाली थी। किसान ने घबराकर पूरी फसल देखी, लेकिन हर बाली अंदर से खोखली थी। उसकी सारी खुशी पलभर में दुख में बदल गई।

वह हाथ जोड़कर बोला, “हे प्रभु! मैंने तो आपकी बताई हर बात मानी, फिर मेरी फसल ऐसी क्यों हो गई?”

परमात्मा बोले, “किसान, यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी भूल थी। तुमने पौधों को जीवन में आने वाले संघर्ष से बचा लिया। उन्हें तेज धूप में तपने नहीं दिया, आँधी से लड़ने नहीं दिया, बारिश की मार सहने नहीं दी और ओलों की चोट से जूझने नहीं दिया।”

“जब तेज हवा चलती है, तब पौधा अपनी जड़ों को मजबूत करता है। जब धूप उसे तपाती है, तब वह अपने भीतर शक्ति पैदा करता है।नवनीत जब आँधी उसे झकझोरती है, तब वह मजबूती से खड़ा होना सीखता है। तुमने उसे हर चुनौती से बचा लिया, इसलिए वह बाहर से तो सुंदर दिखाई दिया, लेकिन अंदर से खोखला रह गया।”

परमात्मा की बात किसान के हृदय में उतर गई।

वास्तव में जीवन भी खेत की तरह है। यदि मनुष्य को हर कठिनाई से बचा लिया जाए, तो वह मजबूत नहीं बन सकता। संघर्ष हमें गिराता जरूर है, लेकिन वही हमें उठना भी सिखाता है। कठिन परिस्थितियाँ हमारे भीतर छिपी शक्ति को बाहर लाती हैं।

सोने को कुंदन बनने के लिए आग में तपना पड़ता है और तलवार को धार पाने के लिए चोट सहनी पड़ती है। उसी प्रकार इंसान को भी जीवन में संघर्ष, असफलता और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इसलिए कठिनाइयों से घबराइए मत। हो सकता है आज का संघर्ष ही आपके आने वाले कल की सबसे बड़ी ताकत बन जाए।

याद रखिए—जिस जीवन में संघर्ष नहीं होता, वह बाहर से सुंदर लेकिन भीतर से खोखला हो सकता है। संघर्ष ही इंसान को मजबूत, सक्षम और मूल्यवान बनाता है !

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार       !

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