रामायण काल की बात है। अयोध्या के महाराज दशरथ के महल में चारों ओर सुख-समृद्धि थी। श्रीराम सभी के प्रिय थे और उनके राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं। पूरी अयोध्या उत्सव के रंग में रंगी हुई थी।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
कैकेयी के दो वरदानों के कारण श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला और भरत को राज्य। यह समाचार सुनकर अयोध्या की खुशियां अचानक मातम में बदल गईं।
श्रीराम चाहते तो अपने पिता के निर्णय का विरोध कर सकते थे, लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा। उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“पिता का वचन मेरे लिए सर्वोपरि है। यदि मेरे वन जाने से उनका वचन पूरा होता है, तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए क्या होगा?”
माता सीता और भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन जाने के लिए तैयार हो गए।
राजमहल की सुख-सुविधाएं छोड़कर तीनों वन की कठिन यात्रा पर निकल पड़े। कभी उन्हें कठोर भूमि पर सोना पड़ा, कभी भूखे रहना पड़ा और कभी घने जंगलों में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लेकिन श्रीराम के चेहरे पर धैर्य बना रहा।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ।
फिर वनवास के दौरान एक और बड़ा संकट आया। रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया। श्रीराम के सामने अब पत्नी की खोज और उन्हें वापस लाने की चुनौती थी।
उन्होंने फिर भी धैर्य नहीं खोया।
हनुमान जी से भेंट हुई, सुग्रीव से मित्रता हुई और वानर सेना का सहयोग मिला। समुद्र पर सेतु बनाया गया और अंततः लंका पर विजय प्राप्त हुई।
चौदह वर्ष पूरे होने के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तो वही अयोध्या जिसने कभी उनके वनवास पर आँसू बहाए थे, आज दीपों से जगमगा रही थी।
श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और प्रजा के जीवन में सुख-शांति लौट आई।
तब श्रीराम ने अपने प्रियजनों से कहा,
“जीवन में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। कठिन समय चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, धैर्य रखने वाला व्यक्ति अंततः अपने लक्ष्य तक पहुंचता है।”
वास्तव में श्रीराम के जीवन ने यह सिखाया कि वनवास उनका अंत नहीं था, बल्कि उसी कठिन यात्रा के बाद उनके जीवन में वह समय आया जब उन्हें अयोध्या का राजा बनकर प्रजा की सेवा करने का अवसर मिला।
कभी-कभी जीवन में सबसे अच्छा पाने के लिए हमें सबसे बुरे दौर से गुजरना पड़ता है। कठिन समय देखकर घबराइए मत और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य मत खोइए। जैसे रात के बाद सुबह अवश्य आती है, वैसे ही कठिनाइयों के बाद अच्छे दिन भी आते हैं।
इसलिए धैर्य रखिए, विश्वास बनाए रखिए और अपने कर्म करते रहिए—समय अवश्य बदलेगा।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
