एक छोटे से कस्बे में अरुण पूनियां नाम का एक पुलिस वाला था। उसकी पहचान थी — ईमानदारी की मिसाल। वो जितना सख़्त अपराधियों के लिए था, उतना ही दयालु गरीब और निर्दोषों के लिए। उसे अपने काम से सच्चा प्रेम था।
अरुण का मानना था कि पुलिस वर्दी का मतलब सिर्फ़ ताकत नहीं, जिम्मेदारी है।”
उसके इसी विचार ने उसे बाकी अफसरों से अलग बना दिया था।
एक दिन की बात एक सुबह थाने में सूचना आई कि पास के गाँव में एक व्यापारी के घर में चोरी हुई है। लाखों के गहने और नकदी गायब थे।
अरुण तुरंत टीम लेकर मौके पर पहुँचा। आसपास पूछताछ की, साक्ष्य जुटाए — लेकिन कोई ठोस सुराग नहीं मिला।
इसी बीच, उसके सीनियर अधिकारी ने कहा —अरुण, मामला जल्दी निपटाना है। मीडिया में खबर फैल गई है। किसी को भी पकड़ लो, बस केस बंद करो।”
अरुण चुप रहा।उसे मालूम था कि गाँव का गरीब मज़दूर रामलाल पहले भी झूठे आरोपों में फँसाया जा चुका है। और इस बार फिर वही निशाने पर था।
अरुण ने आदेश मानने के बजाय खुद जांच जारी रखी।रात-दिन सबूत ढूँढता रहा। उसने पाया कि व्यापारी के ही एक रिश्तेदार ने बीमा के पैसे के लालच में खुद चोरी का नाटक रचा था। अरुण ने सबूत जुटाकर सच्चाई सबके सामने रख दी।
जब अपराधी पकड़ा गया, तो व्यापारी की आँखों में शर्म और अरुण के लिए सम्मान दोनों थे।
सीनियर अधिकारी नाराज़ थे — क्योंकि अरुण ने “ऊपर के आदेश” नहीं माने थे।
उसे ट्रांसफर कर दिया गया, एक दूर के थाने में।
लेकिन अरुण मुस्कुराया और बोला —पोस्टिंग चाहे कहीं भी हो, ईमानदारी का ट्रांसफर नहीं होता।”
ईमानदारी कभी आसान नहीं होती, लेकिन सबसे बड़ी ताकत होती है।
सच्चा पुलिस वाला वही है जो वर्दी को डर नहीं, भरोसे का प्रतीक बनाए।
हर व्यवस्था को एक अरुण पूनियां की ज़रूरत होती है, जो सच के लिए अकेला खड़ा रह सके।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
