” अति बोलने का परिणाम “

एक समय की बात है। एक राज्य में एक राजा रहता था। वह बहुत दयालु था, लेकिन उसमें एक बड़ी कमी थी—वह बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा बोलता था। दरबार हो, सभा हो या किसी से साधारण बातचीत, राजा हर समय बोलता ही रहता था। उसका बुद्धिमान मंत्री यह देखकर चिंतित रहता था। वह चाहता था कि राजा इस आदत को छोड़ दे, लेकिन सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।

एक दिन राजा और मंत्री राजमहल के सुंदर बगीचे में घूम रहे थे। थककर दोनों एक बड़े आम के पेड़ के नीचे रखी पत्थर की शिला पर बैठ गए। उसी पेड़ पर एक कौवे का घोंसला था। उस घोंसले में एक कोयल ने अपना अंडा भी रख दिया था। कौवी उसे अपना अंडा समझकर प्यार से से रही थी।

कुछ दिनों बाद उस अंडे से एक छोटा कोयल का बच्चा निकला। उसके पंख भी ठीक से नहीं आए थे। तभी उसने अपनी मीठी “कुहू-कुहू” की आवाज निकाल दी। कौवी ने सोचा, “यह बच्चा तो हमारे बच्चों जैसा नहीं है।” उसे गुस्सा आ गया। उसने चोंच मारकर उस बच्चे को घोंसले से नीचे गिरा दिया।

वह नन्हा पक्षी सीधे राजा के पैरों के पास आ गिरा। राजा यह देखकर हैरान रह गया। उसने मंत्री से पूछा, “यह बेचारा नीचे कैसे गिर गया?”

मंत्री ने विनम्रता से कहा, “महाराज, यह अति बोलने का परिणाम है। यदि यह बच्चा सही समय आने तक चुप रहता, तो उसके पंख मजबूत हो जाते और वह सुरक्षित उड़ जाता। लेकिन उसने समय से पहले आवाज निकाल दी, जिससे उसकी पहचान हो गई और उसे अपनी जान गंवानी पड़ी।”

फिर मंत्री ने कहा, “मनुष्य के साथ भी ऐसा ही होता है। जो बिना सोचे-समझे और हर समय बोलता रहता है, वह कई बार मुसीबत में पड़ जाता है। समझदार वही है जो सोच-समझकर, सही समय पर और आवश्यकता के अनुसार ही बोले।”

राजा को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने उसी दिन से कम बोलने और सोच-समझकर बोलने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे वह मितभाषी बन गया। उसके इस बदलाव से पूरा राज्य खुश रहने लगा और राजा पहले से भी अधिक सम्मानित हो गया।

 

“बोलने से पहले सोचें। सही समय पर, सही बात और कम शब्दों में कही गई बात ही सबसे प्रभावशाली होती है।”
“मीठी और संयमित वाणी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान होती है।”

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार     !

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