द्वापर युग की बात है। वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण के साथ अनेक ग्वालबाल खेला करते थे। उनमें दो मित्र थे—सुदामा और वत्स। सुदामा सभी से प्रेम करता था, जबकि वत्स स्वभाव से थोड़ा क्रोधी था। उसे अक्सर लगता कि लोग उसकी उपेक्षा करते हैं, इसलिए वह कई लोगों से मन ही मन घृणा करने लगा था।
एक दिन दोनों मित्र श्रीकृष्ण के साथ यमुना तट पर बैठे थे। तभी वत्स ने कहा, “कन्हैया! मैं कुछ लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं करता। उनके दोष मुझे साफ दिखाई देते हैं। लेकिन सुदामा तो हर किसी की प्रशंसा करता रहता है।”
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, “वत्स, क्या तुम बता सकते हो कि तुम उन लोगों से घृणा क्यों करते हो?”
वत्स तुरंत बोला, “हाँ! कोई अहंकारी है, कोई झूठ बोलता है, कोई स्वार्थी है। इसलिए मैं उनसे घृणा करता हूँ।”
फिर श्रीकृष्ण ने सुदामा से पूछा, “और तुम सबसे प्रेम क्यों करते हो?”
सुदामा कुछ देर मौन रहा। फिर बोला, “प्रभु, मैं इतना ही जानता हूँ कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई अवश्य होती है। बस उसी अच्छाई के कारण मेरा मन उनसे प्रेम करने लगता है।”
श्रीकृष्ण ने पास पड़े दो पात्र उठाए। एक में सुगंधित पुष्प थे और दूसरे में कीचड़ भरा था।
उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति केवल दोष खोजता है, उसका मन इस कीचड़ के समान हो जाता है। उसे हर जगह गंदगी ही दिखाई देती है। लेकिन जो गुणों को पहचानता है, उसका हृदय इन पुष्पों की तरह सुगंध फैलाता है।”
फिर श्रीकृष्ण बोले, “वत्स! तुमने जिन लोगों से घृणा की, उनके दोष तो गिना दिए। अब बताओ, उनमें कोई एक गुण भी है?”
वत्स सोचने लगा। कुछ देर बाद बोला, “प्रभु, सच तो यह है कि उनमें भी कुछ अच्छे गुण हैं। किसी में दया है, किसी में परिश्रम, किसी में सत्य बोलने की आदत। लेकिन मैंने कभी उन गुणों पर ध्यान ही नहीं दिया।”
श्रीकृष्ण ने कहा, “यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। घृणा का कारण तो तुरंत याद रहता है, लेकिन प्रेम का कारण भूल जाता है। यदि तुम लोगों के गुणों को पहचानोगे, तो तुम्हारा हृदय प्रेम से भर जाएगा।”
वत्स की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने सभी साथियों से क्षमा माँगी और निश्चय किया कि अब वह लोगों के दोष नहीं, उनके गुण देखेगा।
उस दिन से वृंदावन में उसका स्वभाव बदल गया। जो पहले उससे दूर रहते थे, वही अब उसके प्रिय मित्र बन गए। उसे समझ आ गया कि प्रेम से संबंध बनते हैं और घृणा से केवल मन अशांत होता है।
दूसरों के दोष देखने से पहले उनके गुणों को पहचानिए। घृणा सबसे पहले हमारे अपने मन को जलाती है, जबकि प्रेम जीवन में शांति, सुख और मधुरता लाता है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा अपनाइए—गुणों से प्रेम कीजिए, दोषों से नहीं।
- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
