” अहंकार का अंत और नारद मुनि की सीख “

एक समय की बात है। देवर्षि नारद जी भगवान का निरंतर नाम-स्मरण करते थे। एक दिन उनके मन में यह विचार आया कि तीनों लोकों में उनसे बड़ा भगवान का भक्त कोई नहीं है। धीरे-धीरे यह विचार अहंकार में बदल गया।

भगवान विष्णु अपने भक्त के मन का भाव समझ गए। उन्होंने नारद जी का अहंकार दूर करने का निश्चय किया।

भगवान ने मुस्कुराकर कहा, “नारद, क्या तुम मेरे एक भक्त से मिलकर आओगे?”

नारद जी तुरंत तैयार हो गए। भगवान उन्हें एक छोटे से गाँव में रहने वाले साधारण किसान के पास ले गए।

वह किसान सुबह उठते ही भगवान का नाम लेता, पूरे दिन खेतों में मेहनत करता, अपने माता-पिता की सेवा करता, परिवार का पालन-पोषण करता और रात को सोने से पहले फिर भगवान का स्मरण करके सो जाता।

यह देखकर नारद जी आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने भगवान से कहा, “प्रभु! यह तो दिन में केवल दो बार आपका नाम लेता है, जबकि मैं हर समय आपका नाम जपता रहता हूँ। फिर यह आपका महान भक्त कैसे हुआ?”

भगवान विष्णु ने नारद जी को तेल से भरा एक पात्र दिया और कहा, “इस पात्र को लेकर पूरे नगर का एक चक्कर लगाओ। ध्यान रहे, तेल की एक भी बूँद नीचे नहीं गिरनी चाहिए।”

नारद जी पूरे ध्यान से नगर का चक्कर लगाकर लौट आए। तेल की एक भी बूँद नहीं गिरी।

भगवान ने मुस्कुराकर पूछा, “नारद, नगर का चक्कर लगाते समय तुमने मेरा नाम कितनी बार लिया?”

नारद जी ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “प्रभु, मेरा पूरा ध्यान तेल पर था, इसलिए मैं आपका नाम एक बार भी नहीं ले सका।”

भगवान बोले, “यह किसान पूरे दिन अपने परिवार, खेत और जिम्मेदारियों का भार उठाता है। फिर भी वह दिन में दो बार पूरे मन से मेरा स्मरण करता है। उसकी भक्ति में दिखावा नहीं, सच्चा प्रेम और समर्पण है।”

यह सुनकर नारद जी का अहंकार तुरंत समाप्त हो गया। उन्होंने भगवान के चरणों में प्रणाम किया और कहा, “प्रभु, आज मुझे समझ में आ गया कि सच्ची भक्ति नामों की गिनती में नहीं, बल्कि मन की सच्चाई, विनम्रता और प्रेम में होती है।”

उस दिन के बाद नारद जी ने कभी अपनी भक्ति का अभिमान नहीं किया और पहले से भी अधिक विनम्र होकर भगवान की सेवा करने लगे।

 

अहंकार चाहे ज्ञान का हो, धन का हो, शक्ति का हो या भक्ति का—उसका अंत निश्चित है। भगवान को वही प्रिय है जो विनम्र, सरल और निष्कपट हृदय से अपना कर्तव्य निभाते हुए उनका स्मरण करता है। सच्ची महानता विनम्रता में है, अहंकार में नहीं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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