” सच्ची सेवा ही सच्ची भक्ति “

द्वापर युग की बात है। भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका राज्य में एक दिन घोषणा हुई कि अगले दिन राजमहल में एक विशेष सभा होगी। जो भी स्वयं को भगवान का सबसे बड़ा भक्त मानता हो, वह सभा में अवश्य आए।

अगले दिन अनेक ऋषि, विद्वान, साधु और भक्त सुंदर वस्त्र पहनकर राजमहल पहुँचने लगे। सभी मन ही मन सोच रहे थे कि आज भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अवश्य सम्मानित करेंगे।

लेकिन महल के मुख्य द्वार पर एक घायल बछड़ा दर्द से तड़प रहा था। उसके पैर में काँटा चुभा था और वह उठ भी नहीं पा रहा था।

अधिकांश लोग उसे देखकर आगे बढ़ गए। किसी ने सोचा, “पहले भगवान के दर्शन कर लें, बाद में इसकी सहायता करेंगे।” किसी ने कहा, “यह काम सेवकों का है।”

उसी समय एक गरीब ग्वाला माधव वहाँ पहुँचा। उसने बछड़े की पीड़ा देखी तो तुरंत अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़कर उसके घाव पर बाँधा। काँटा निकाला, उसे पानी पिलाया और पास की हरी घास खिलाई। जब तक बछड़ा चलने योग्य नहीं हो गया, वह वहीं बैठा रहा। इसी कारण वह सभा में देर से पहुँचा।

सभा समाप्त होने वाली थी। तब भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, “आज सबसे बड़ा भक्त हमारे बीच आ चुका है।”

सभी ने इधर-उधर देखा। श्रीकृष्ण ने माधव को अपने पास बुलाया, उसे गले लगाया और कहा, “जिसने मेरे प्राणी की सेवा की, उसने मेरी ही सेवा की है।”

सभा में बैठे लोग आश्चर्यचकित रह गए।

तब श्रीकृष्ण बोले, “जो केवल पूजा करता है, वह मेरा भक्त हो सकता है। लेकिन जो हर जीव में मेरा स्वरूप देखकर उसकी सेवा करता है, वही मेरा प्रिय भक्त है।”

सभी ऋषियों और भक्तों ने सिर झुका लिया। उन्हें समझ आ गया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में दीप जलाने से नहीं, बल्कि किसी दुखी, असहाय और पीड़ित जीव की निस्वार्थ सेवा करने से होती है।

उस दिन से द्वारका के लोगों ने संकल्प लिया कि वे केवल पूजा ही नहीं करेंगे, बल्कि हर जरूरतमंद की सहायता भी करेंगे।

 

ईश्वर को केवल फूल, माला और भोग से नहीं, बल्कि दया, करुणा और निस्वार्थ सेवा से सबसे अधिक प्रसन्न किया जा सकता है। जो हर जीव में भगवान का रूप देखता है, वही सच्चा भक्त कहलाता है।
“जीव सेवा ही शिव सेवा है, और सच्ची सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।”

 

    •  राम कुमार दीक्षित, पत्रकार    !

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