” हनुमान जी और अहिरावण का वध “

लंका का युद्ध अपने चरम पर था। रावण के अनेक योद्धा मारे जा चुके थे। जब रावण को लगा कि अब उसकी हार निश्चित है, तब उसने अपने मायावी भाई अहिरावण को याद किया। अहिरावण पाताल लोक का राजा था और तंत्र-मंत्र तथा मायावी शक्तियों में अत्यंत प्रवीण था।

अहिरावण ने रावण से कहा, “भाई, चिंता मत करो। मैं श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले जाकर उनकी बलि चढ़ा दूँगा।”

रात के समय जब पूरी वानर सेना सो रही थी, तब हनुमान जी भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की रक्षा के लिए द्वार पर पहरा दे रहे थे। अहिरावण ने विभीषण का रूप धारण कर लिया और छलपूर्वक शिविर में प्रवेश कर गया। अपनी मायावी शक्ति से उसने सभी को गहरी नींद में सुला दिया और श्रीराम तथा लक्ष्मण को उठाकर पाताल लोक ले गया।

सुबह जब सभी जागे तो प्रभु को न पाकर हाहाकार मच गया। विभीषण ने तुरंत समझ लिया कि यह कार्य अहिरावण का है। उन्होंने हनुमान जी से कहा, “हे पवनपुत्र! केवल आप ही पाताल लोक जाकर प्रभु को वापस ला सकते हैं।”

हनुमान जी बिना देर किए पाताल लोक की ओर चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक विशाल द्वार मिला, जिसकी रक्षा एक बलवान योद्धा कर रहा था। उसका नाम मकरध्वज था। उसने हनुमान जी को रोकते हुए कहा, “बिना युद्ध किए कोई अंदर नहीं जा सकता।”

दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में हनुमान जी ने उसे परास्त कर दिया। तब मकरध्वज ने बताया कि वह हनुमान जी का ही पुत्र है, जिसका जन्म समुद्र में गिरी उनकी पसीने की एक बूंद से हुआ था। हनुमान जी ने उसे आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गए।

पाताल लोक में पहुँचकर हनुमान जी ने देखा कि अहिरावण एक विशाल यज्ञ की तैयारी कर रहा है। श्रीराम और लक्ष्मण को बलि के लिए बाँधकर रखा गया था। विभीषण ने बताया था कि अहिरावण को मारने के लिए पाँच दिशाओं में जल रहे पाँच दीपकों को एक साथ बुझाना होगा, अन्यथा वह बार-बार जीवित हो जाएगा।

हनुमान जी ने तुरंत पंचमुखी रूप धारण किया। पूर्व दिशा में हनुमान मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, उत्तर में वराह मुख, दक्षिण में नरसिंह मुख और ऊपर की ओर हयग्रीव मुख प्रकट हुआ। पाँचों मुखों से एक साथ फूँक मारकर उन्होंने पाँचों दीपक बुझा दिए।

दीपक बुझते ही अहिरावण की मायावी शक्ति समाप्त हो गई। हनुमान जी ने अपनी गदा से उस दुष्ट राक्षस का वध कर दिया। पूरा पाताल लोक उनके जयघोष से गूँज उठा।

इसके बाद उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर सुरक्षित वापस लंका ले आए। पूरी वानर सेना आनंदित हो उठी और “जय हनुमान!” के नारे लगाने लगी।

साहस, बुद्धि, भक्ति और दृढ़ संकल्प से सबसे बड़ी बुराई को भी पराजित किया जा सकता है। जो व्यक्ति सच्चे मन से अपने कर्तव्य का पालन करता है, ईश्वर उसकी हर कठिनाई में सहायता करते हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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