” अहंकार की कीमत “

प्राचीन समय की बात है। आर्यवर्त के एक समृद्ध राज्य में वीरेंद्र नाम का एक प्रतापी राजा शासन करता था। उसका दरबार दूर-दूर तक अपनी भव्यता और वैभव के लिए प्रसिद्ध था। प्रतिदिन अनेक विद्वान, व्यापारी, कलाकार और यात्री उसके दरबार में उपस्थित होकर अपनी कला और बुद्धिमत्ता का परिचय देते थे।

एक दिन प्रातःकाल दरबार सजा ही था कि द्वारपाल ने सूचना दी, “महाराज, एक विदेशी यात्री आपसे भेंट करना चाहता है।”

राजा ने उसे भीतर बुलाने का आदेश दिया।

कुछ ही क्षणों में एक लंबा, तेजस्वी और गंभीर व्यक्तित्व वाला व्यक्ति दरबार में प्रवेश कर गया। उसके वस्त्र अनोखे थे और सिर पर बंधी पगड़ी अत्यंत आकर्षक दिखाई दे रही थी। वह पगड़ी रंग-बिरंगे रेशमी कपड़ों से बनी थी, जिस पर स्वर्ण और रत्नों की कारीगरी चमक रही थी। पूरा दरबार उसकी पगड़ी को आश्चर्य से निहारने लगा।

राजा भी स्वयं को रोक न सका। उसने मुस्कुराकर पूछा, “हे यात्री! तुम्हारी यह पगड़ी अद्भुत है। बताओ, इसकी कीमत क्या है?”

यात्री ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “महाराज, इसकी कीमत एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ है।”

यह सुनते ही दरबार में हलचल मच गई। राजा के समीप बैठा चतुर वजीर धीरे से राजा के कान में बोला, “महाराज, यह व्यक्ति आपको मूर्ख बनाना चाहता है। यह पगड़ी अधिक से अधिक बीस-पच्चीस स्वर्ण मुद्राओं की होगी।”

यात्री ने वजीर की चालाकी भांप ली। वह मुस्कुराया और गंभीर स्वर में बोला, “यदि यह दरबार मेरी पगड़ी का मूल्य नहीं समझ सकता, तो मैं यहाँ से चला जाता हूँ। मुझे बताया गया था कि इस धरती पर केवल एक ही ऐसा सम्राट है, जो इस पगड़ी का सम्मान कर सकता है। शायद मैं गलत स्थान पर आ गया हूँ।”

उसकी बात सुनकर राजा का अहंकार जाग उठा। उसे लगा कि यदि उसने पगड़ी नहीं खरीदी, तो उसकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। उसने तुरंत आदेश दिया, “इस यात्री को दो हजार स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँ और यह पगड़ी राजकोष में रखी जाए।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। वजीर आश्चर्यचकित रह गया। सभा समाप्त होने के बाद वह विदेशी यात्री के पास गया और धीमे स्वर में बोला, “तुमने साधारण सी पगड़ी के बदले इतना धन कैसे प्राप्त कर लिया?”

यात्री मुस्कुराया और बोला, “मित्र, तुम पगड़ी की कीमत जानते हो, पर मैं राजाओं की कमजोरी पहचानता हूँ। संसार में अनेक लोग वस्तुओं का नहीं, बल्कि मनुष्य के अहंकार और लालसा का व्यापार करते हैं।”

वजीर निरुत्तर हो गया।

उस दिन राजा भी अपनी भूल समझ चुका था। उसे ज्ञात हुआ कि मनुष्य जब अहंकार, प्रशंसा और दिखावे के मोह में फँस जाता है, तब उसकी बुद्धि निर्णय लेने की शक्ति खो देती है।

 

जो व्यक्ति अपनी कमजोरियों पर नियंत्रण नहीं रखता, संसार उसे आसानी से छल सकता है। विवेक, विनम्रता और आत्मज्ञान ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार  !

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