एक छोटे से गाँव में मोहन नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था। उसका जीवन बहुत साधारण था। सुबह होते ही वह जंगल चला जाता, लकड़ियाँ काटता और उन्हें बेचकर अपने परिवार का पेट पालता। गरीबी के बावजूद उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी, क्योंकि उसका दिल बहुत दयालु था। गाँव में कोई बीमार पड़ जाए, किसी को मदद की ज़रूरत हो या किसी जानवर को चोट लग जाए—मोहन सबसे पहले सहायता के लिए पहुँच जाता था।
एक दिन की बात है। गर्मी बहुत तेज थी। मोहन जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठी करते-करते थक गया। उसने सोचा थोड़ी देर आराम कर लिया जाए। वह एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गया। तभी अचानक उसे “चीं-चीं” की तेज आवाज सुनाई दी। उसने ऊपर देखा तो एक घोंसले में छोटे-छोटे चिड़िया के बच्चे डर से कांप रहे थे। पास ही एक जहरीला साँप धीरे-धीरे घोंसले की ओर बढ़ रहा था।
मोहन तुरंत समझ गया कि यदि उसने कुछ नहीं किया तो साँप उन मासूम बच्चों को खा जाएगा। अपनी जान की परवाह किए बिना वह तेजी से पेड़ पर चढ़ गया। उसे देखकर साँप डर गया और नीचे उतरने लगा। तभी बच्चों की माँ चिड़िया वहाँ लौट आई। उसने मोहन को पेड़ पर देखा तो गलतफहमी में समझ बैठी कि वही उसके बच्चों को नुकसान पहुँचाने आया है।
वह गुस्से में मोहन पर चोंच मारने लगी। उसकी आवाज सुनकर दूसरी चिड़ियाँ भी आ गईं और सबने मिलकर मोहन पर हमला कर दिया। बेचारा मोहन दर्द सहते हुए किसी तरह नीचे उतर आया। उसने मन में ज़रा भी गुस्सा नहीं किया। वह चुपचाप वहाँ से जाने लगा।
कुछ देर बाद चिड़िया घोंसले में पहुँची तो उसके बच्चे सुरक्षित थे। बच्चों ने अपनी भाषा में सारी बात बताई कि कैसे मोहन ने उनकी जान बचाई। यह सुनकर चिड़िया को अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ। वह तुरंत मोहन के पास पहुँची।
कुछ दिन पहले उसे जंगल में एक चमकता हुआ हीरा मिला था, जिसे उसने अपने घोंसले में छिपाकर रखा था। चिड़िया वह हीरा अपनी चोंच में दबाकर लाई और मोहन के सामने डाल दिया। फिर वह उसके ऊपर उड़ते हुए मानो धन्यवाद कहने लगी। मोहन समझ गया कि यह उस चिड़िया का प्यार और आभार है। उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
उस दिन मोहन ने महसूस किया कि सच्ची नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती। चाहे दुनिया आपको तुरंत समझे या नहीं, लेकिन अच्छे कर्म का फल एक दिन अवश्य मिलता है। गाँव लौटते समय कई चिड़ियाँ उसके ऊपर उड़ती रहीं, जैसे वे उसकी अच्छाई को सलाम कर रही हों।
दूसरों की भलाई करने वाला व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं रहता। नेकी का फल देर से ही सही, लेकिन अवश्य मिलता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
