एक छोटे से गाँव में तीन भाई अपने बड़े भाई के साथ बहुत गरीबी में जीवन बिता रहे थे। उनके घर की हालत इतनी खराब थी कि कभी-कभी दो वक्त का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो जाता था। घर के पीछे एक फली का पेड़ था, वही उनकी रोज़ी-रोटी का एकमात्र सहारा था। रोज़ शाम को वे उस पेड़ से कुछ फलियाँ तोड़ते, बाज़ार में बेचते और उससे जो थोड़े पैसे मिलते, उसी से आटा-दाल खरीदकर गुज़ारा करते।
एक दिन उनके बचपन का मित्र, जो अब एक विद्वान और सफल व्यक्ति बन चुका था, गाँव आया। उसे अपने पुराने मित्र की याद आई और वह उससे मिलने पहुँच गया। मित्र ने उसका आदर-सत्कार किया, लेकिन विद्वान ने उनकी गरीबी और संघर्ष को करीब से देखा। रात के भोजन के समय उसने महसूस किया कि घर में खाना कम है। इसलिए एक भाई ने पेट खराब होने का बहाना बना लिया और दूसरे ने उपवास का। केवल उसका मित्र उसके साथ बैठकर भोजन करने लगा।
यह दृश्य देखकर विद्वान का मन बेचैन हो उठा। वह सोचने लगा कि आखिर इनकी गरीबी कैसे दूर हो? रातभर उसे नींद नहीं आई। अचानक उसके मन में एक विचार आया। वह चुपचाप उठा, कुल्हाड़ी ली और आँगन में खड़े उसी फली के पेड़ को काट डाला। फिर बिना किसी को बताए रातों-रात गाँव छोड़कर चला गया।
सुबह जब लोगों ने पेड़ कटा देखा तो पूरे गाँव में हंगामा मच गया। सब विद्वान को कोसने लगे। तीनों भाई भी दुखी थे, क्योंकि उनका एकमात्र सहारा खत्म हो चुका था। अब उनके सामने भूख और बेरोज़गारी का अंधेरा था।
लेकिन जीवन यहीं नहीं रुका।
मजबूरी ने उन्हें मेहनत करना सिखा दिया। उन्होंने खेतों में काम किया, छोटी-मोटी मजदूरी की, नए हुनर सीखे और धीरे-धीरे अपना छोटा व्यापार शुरू किया। संघर्ष कठिन था, पर अब उनके पास कोई सहारा नहीं था, इसलिए हार मानने का विकल्प भी नहीं था। कुछ वर्षों बाद उनकी मेहनत रंग लाई। उनकी टूटी झोपड़ी की जगह अब एक सुंदर मकान बन चुका था और गाँव में उनका सम्मान होने लगा था।
करीब तीन साल बाद वही विद्वान फिर उस गाँव से गुज़रा। उसके मन में डर था कि कहीं लोग उसे अपमानित न करें। लेकिन जब वह अपने मित्र के घर पहुँचा तो आश्चर्यचकित रह गया। सामने आलीशान घर था और तीनों भाई खुशहाल जीवन जी रहे थे।
उसे देखते ही तीनों भाई भावुक हो गए और उसके चरणों में गिर पड़े। उन्होंने कहा, “यदि उस रात तुम फली का पेड़ न काटते, तो हम आज भी उसी सहारे के भरोसे गरीबी में जी रहे होते। तुमने हमारा सहारा नहीं छीना था, बल्कि हमें आत्मनिर्भर बनना सिखाया था।”
यह सुनकर विद्वान की आँखें भी नम हो गईं।
जीवन में कई बार हमारा सबसे बड़ा सहारा ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। जब तक हम अपने “कंफर्ट ज़ोन” में रहते हैं, तब तक आगे बढ़ने की ताकत नहीं जुटा पाते। संघर्ष और आवश्यकता ही इंसान की असली क्षमता को बाहर लाते हैं। आत्मनिर्भरता ही सफलता और प्रगति का सच्चा मार्ग है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
