जो छूट जाता है, वही कभी-कभी हमें बेहतर मंज़िल तक पहुँचाता है…
एक बड़े शहर के प्रसिद्ध संग्रहालय के बेसमेंट में वर्षों पुरानी कई पेंटिंग्स रखी थीं। उन पर धूल जमी थी और चारों ओर सन्नाटा पसरा रहता था। उसी बेसमेंट के एक कोने में एक छोटी-सी मकड़ी ने बड़ी मेहनत से अपना सुंदर जाला बनाया हुआ था।
वह जाला उसके लिए सिर्फ धागों का जाल नहीं था…
वह उसका घर था, उसकी दुनिया था, उसका सपना था।
मकड़ी रोज़ उसे बड़े प्यार से सजाती-सँवारती और मन ही मन सोचती—
“दुनिया में इससे बेहतर जगह कहीं नहीं हो सकती।”
एक दिन संग्रहालय में सफाई और नवीनीकरण का काम शुरू हुआ। बेसमेंट में रखी पुरानी पेंटिंग्स को ऊपर प्रदर्शनी कक्ष में ले जाया जाने लगा।
यह देखकर बाकी मकड़ियाँ तुरंत अपने जाले छोड़कर दूसरी जगह चली गईं।
लेकिन वह मकड़ी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई।
उसने सोचा—
“सारी पेंटिंग्स थोड़ी ना हटेंगी… मेरी वाली यहीं रहेगी।”
दिन बीतते गए…
एक-एक करके लगभग सारी पेंटिंग्स हट गईं, लेकिन मकड़ी फिर भी अपने जाले से चिपकी रही।
उसे डर था कि अगर यह जगह छोड़ दी, तो शायद इससे अच्छी जगह कभी नहीं मिलेगी।
लेकिन एक सुबह अचानक संग्रहालय के कर्मचारी उसी पेंटिंग को उठाने आ पहुँचे, जिस पर उसका जाला था।
अब मकड़ी के पास दो ही रास्ते थे—
या तो जाले से चिपकी रहे और कुचल दी जाए…
या फिर सब कुछ छोड़कर नई शुरुआत करे।
भारी मन से उसने अपना खूबसूरत घर छोड़ दिया।
उस दिन के बाद कई दिनों तक वह भटकती रही।
कभी धूल, कभी बारिश, कभी तेज हवा…
हर दिन नई परेशानी उसका इंतजार करती।
वह अक्सर आसमान की ओर देखकर शिकायत करती—
“भगवान! मेरा सब कुछ क्यों छीन लिया?”
उसे अपना पुराना घर याद आता और आँखें नम हो जातीं।
लेकिन जीवन रुकता नहीं…
जीने के लिए उसे फिर से नया ठिकाना ढूँढना ही था।
एक दिन भटकते-भटकते वह एक सुंदर बगीचे में पहुँची।
चारों ओर हरियाली, ठंडी हवा और फूलों की खुशबू थी।
बगीचे के एक शांत कोने को देखकर उसके मन में उम्मीद जागी।
उसने फिर से मेहनत शुरू की।
दिन-रात की मेहनत के बाद उसने वहाँ ऐसा सुंदर जाला बनाया, जो पहले वाले से भी कहीं ज्यादा मजबूत और खूबसूरत था।
अब उसे समझ आया—
जिसे वह अपनी सबसे बड़ी बदकिस्मती समझ रही थी…
असल में वही उसे बेहतर जीवन की ओर ले जाने वाला रास्ता था।
उस दिन मकड़ी मुस्कुराई और बोली—
“अगर पुराना नहीं टूटता…तो नया और बेहतर कभी नहीं बनता।”
जीवन में कई बार हमारा बना-बनाया संसार बिखर जाता है—नौकरी चली जाती है, व्यापार टूट जाता है, रिश्ते बदल जाते हैं या अपने साथ छोड़ देते हैं।
उस समय लगता है कि सब खत्म हो गया…
लेकिन सच यह है कि ईश्वर कई बार हमें बेहतर जगह पहुँचाने के लिए पुरानी जगह से हटाता है।
यदि हौसला, मेहनत और विश्वास बना रहे…
तो टूटने के बाद भी इंसान पहले से ज्यादा मजबूत बनकर उभरता है।
याद रखिए… “जो आज छिन रहा है,हो सकता है वही कल आपको बेहतर देने की तैयारी हो।”
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
