राजा ने उन्हें पास बुलाया और विनम्रता से कहा, “बच्चों, क्या मुझे थोड़ा भोजन और पानी मिल सकता है? मैं बहुत भूखा और प्यासा हूँ।” बच्चों ने बिना देर किए कहा, “अभी लाते हैं।” वे तुरंत गाँव भागे और थोड़ी ही देर में भोजन और पानी लेकर लौट आए। बच्चों की सेवा भावना और सादगी देखकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ।
राजा ने कहा, “तुम तीनों ने मेरी बहुत सहायता की है। बताओ, तुम जीवन में क्या चाहते हो? मैं तुम्हारी इच्छाएँ पूरी करूँगा।”
पहले बालक ने कहा, “मुझे धन चाहिए, ताकि मैं कभी भूखा न रहूँ।” राजा ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली।
दूसरे बालक ने कहा, “मुझे बड़ा घर और घोड़ा-गाड़ी चाहिए।” राजा ने उसे भी यह सब देने का वचन दिया।
तीसरे बालक ने शांत स्वर में कहा, “मुझे धन या वैभव नहीं चाहिए। मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मैं पढ़-लिखकर विद्वान बन सकूँ और देश की सेवा कर सकूँ।” राजा उसकी बात सुनकर अत्यंत प्रभावित हुआ और उसके लिए उत्तम शिक्षा की व्यवस्था कर दी।
समय बीतता गया। तीसरा बालक मेहनत और लगन से पढ़ाई करता रहा और एक दिन बहुत बड़ा विद्वान बन गया। उसकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर राजा ने उसे अपने राज्य का मंत्री बना दिया।
कई वर्षों बाद राजा को वह पुरानी घटना याद आई। उसने मंत्री से कहा कि अपने दोनों पुराने मित्रों को भी बुलाओ। अगले दिन तीनों मित्र फिर एक साथ राजा के सामने उपस्थित हुए।
राजा ने उनसे हालचाल पूछा। पहले बालक ने दुखी होकर कहा, “महाराज, मैंने धन पाकर उसे व्यर्थ खर्च कर दिया और आज फिर गरीब हो गया हूँ।” दूसरे ने कहा, “मेरा घर और वैभव एक प्राकृतिक आपदा में नष्ट हो गया और मैं भी पहले जैसा हो गया हूँ।”
राजा ने गंभीर होकर कहा, “याद रखो, धन और संपत्ति नश्वर हैं, वे कभी भी नष्ट हो सकते हैं। लेकिन ज्ञान एक ऐसा धन है जो जीवनभर साथ रहता है और कोई उसे छीन नहीं सकता। शिक्षा ही मनुष्य को महान बनाती है।”
तीनों मित्रों ने उस दिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझा—सच्चा धन ‘विद्या’ ही है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
