लेकिन जैसे ही वह आकाश में उड़ा, कुछ चीलों ने उसे देख लिया। वे तेजी से उसके पीछे पड़ गईं। कौवा डर गया। वह और ऊँचा, और तेज उड़ने लगा, लेकिन चीलें उसका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थीं। कौवे की साँसें तेज हो गईं, उसका मन घबराहट और डर से भर गया। उसे लगने लगा कि अब उसकी जान नहीं बचेगी।
उसी समय, आसमान में उड़ते हुए एक गरुड़ ने उसकी परेशानी देखी। वह उसके पास आया और शांत स्वर में बोला, “मित्र, तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?” कौवे ने काँपते हुए कहा, “इन चीलों को देखो! ये मुझे मार डालेंगी।” गरुड़ मुस्कुराया और बोला, “वे तुम्हें नहीं, उस मांस के टुकड़े को चाहती हैं जिसे तुमने पकड़ा हुआ है। अगर तुम इसे छोड़ दो, तो देखना क्या होता है।”
कौवे ने पहले तो संकोच किया, क्योंकि वह उस मांस को छोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन जब उसे अपनी जान का खतरा महसूस हुआ, तो उसने गरुड़ की बात मान ली और मांस का टुकड़ा नीचे गिरा दिया। जैसे ही मांस गिरा, सारी चीलें तुरंत उसकी ओर झपट पड़ीं और कौवे का पीछा छोड़ दिया।
अब कौवा पूरी तरह सुरक्षित था। उसने राहत की साँस ली और पहले से भी ज्यादा ऊँचाई में उड़ने लगा। उसे समझ आ गया कि असली खतरा चीलें नहीं थीं, बल्कि वह बोझ था जिसे वह पकड़े हुए था। गरुड़ ने उसे समझाया, “जब तक हम अनावश्यक चीजों को पकड़े रहते हैं, तब तक हम डर, तनाव और परेशानी में रहते हैं। जैसे ही हम उन्हें छोड़ देते हैं, हम आज़ाद हो जाते हैं।”
नयासर गाँव के लोगों ने इस घटना को देखा और उससे बड़ी सीख ली। उन्होंने समझा कि जीवन में हम भी कई बार अहंकार, क्रोध, तुलना और नकारात्मक भावनाओं का बोझ उठाए रखते हैं। यही चीजें हमें परेशान करती हैं और हमारी शांति छीन लेती हैं। अगर हम इन्हें “बस छोड़ दें”, तो जीवन सरल और सुखी हो सकता है।
इस कहानी का सार यही है कि जो चीजें हमें नीचे खींचती हैं, उन्हें पकड़कर रखने की बजाय छोड़ देना ही बेहतर है। जब मन हल्का होता है, तभी हम जीवन में ऊँची उड़ान भर सकते हैं।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
