राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव में रामनारायण नाम का एक बुज़ुर्ग व्यक्ति रहता था। उसका जीवन बहुत संघर्षों से भरा रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा संतोष और स्नेह झलकता था। गाँव के लोग उसे बहुत सम्मान देते थे, क्योंकि वह ईमानदार और सरल स्वभाव का इंसान था। उसकी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो चुका था, और उसका एक ही बेटा था—मोहन—जिसे उसने अपनी पूरी मेहनत और प्यार से बड़ा किया था।
सालों पहले की बात थी, जब रामनारायण और उसकी पत्नी की कोई संतान नहीं थी। दोनों बहुत दुखी रहते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। एक दिन वे बीकानेर शहर के एक अनाथालय गए और वहाँ से एक छोटे से मासूम बच्चे को गोद लिया। उसी बच्चे का नाम उन्होंने मोहन रखा। उस दिन से उनकी दुनिया बदल गई। रामनारायण ने खेतों में दिन-रात मेहनत की, ताकि मोहन को अच्छी पढ़ाई मिल सके और उसका भविष्य उज्ज्वल बने।
समय बीतता गया, मोहन बड़ा हुआ, पढ़-लिखकर शहर में नौकरी करने लगा और कुछ साल बाद उसकी शादी भी हो गई। शुरू-शुरू में सब ठीक चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे मोहन की पत्नी को अपने ससुर का साथ पसंद नहीं आने लगा। उसे लगता था कि बूढ़े पिता की देखभाल करना एक बोझ है। वह अक्सर मोहन से कहती, “हमारी अपनी जिंदगी है, हर समय इनके कारण परेशानी होती है।”
मोहन अपनी पत्नी की बातों में आकर धीरे-धीरे अपने पिता से दूरी बनाने लगा। रामनारायण यह सब समझते थे, लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। वे हमेशा बेटे की खुशी में ही अपनी खुशी मानते थे।
एक दिन मोहन की पत्नी ने साफ शब्दों में कह दिया, “अब बहुत हो गया, इन्हें किसी अनाथ आश्रम में छोड़ आओ। हम और बोझ नहीं उठा सकते।” मोहन पहले तो झिझका, लेकिन पत्नी के दबाव में आकर उसने वही करने का निर्णय ले लिया।
अगले दिन मोहन अपने पिता को साथ लेकर शहर के एक अनाथ आश्रम पहुँचा। रास्ते भर रामनारायण चुपचाप बैठे रहे, उनके चेहरे पर न कोई शिकायत थी, न कोई गुस्सा—बस एक गहरी उदासी थी नवनीत। आश्रम पहुँचकर मोहन ने जरूरी कागज़ी कार्यवाही पूरी की और अपने पिता को वहीं छोड़कर वापस जाने लगा।
जैसे ही वह घर की ओर लौट रहा था, उसकी पत्नी का फोन आया। उसने कठोर स्वर में कहा, “अपने पिता से यह भी कह देना कि अब त्योहारों पर भी घर आने की जरूरत नहीं है। अब वहीं रहें, ताकि हम शांति से जी सकें।”
यह सुनकर मोहन का मन अचानक भारी हो गया। उसने गाड़ी मोड़ी और वापस अनाथ आश्रम की ओर चल पड़ा। जब वह वहाँ पहुँचा, तो उसने एक अजीब दृश्य देखा। उसका पिता आश्रम के मैनेजर के साथ बड़े आराम से बैठकर हँसते-बोलते बातें कर रहा था, जैसे दोनों एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों।
मोहन को यह देखकर आश्चर्य हुआ। उसने मैनेजर से पूछा, “सर, आप मेरे पिता को कब से जानते हैं?”
मैनेजर ने मुस्कराते हुए कहा, “बहुत सालों से… जब ये यहाँ आए थे—आपको गोद लेने के लिए।”
यह सुनते ही मोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आँखों के सामने बचपन की सारी यादें घूमने लगीं—पिता का उसे कंधों पर बिठाना, उसकी पढ़ाई के लिए खेतों में पसीना बहाना, और हर मुश्किल में उसका साथ देना। आज वही पिता, जिसने उसे अनाथालय से अपनाकर जीवन दिया था, उसी को वह फिर से अनाथ बना आया था।
मोहन की आँखों से आँसू बहने लगे। वह तुरंत अपने पिता के पास गया, उनके चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, “पिताजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं बहुत बड़ा अपराध कर बैठा हूँ।”
रामनारायण ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और शांत स्वर में कहा, “बेटा, गलती इंसान से ही होती है। लेकिन जो अपनी गलती समझ ले, वही सच्चा इंसान कहलाता है।”
उस दिन मोहन अपने पिता को वापस घर ले आया नवनीत। उसने अपनी पत्नी को भी समझाया कि माता-पिता कोई बोझ नहीं होते, बल्कि वे हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। धीरे-धीरे उसकी पत्नी को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने रामनारायण से माफी माँग ली।
माता-पिता हमारे जीवन के वे अनमोल रत्न हैं, जो हमें बिना किसी शर्त के प्रेम देते हैं। उन्होंने हमें जीवन दिया, पालन-पोषण किया और हर मुश्किल में साथ दिया। इसलिए हमें कभी भी अपने माता-पिता का अपमान नहीं करना चाहिए, बल्कि उनका सम्मान और सेवा करना ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

