” सच्चा तीर्थ “

दो युवा संन्यासी लंबी यात्रा करते हुए एक छोटे से गाँव में पहुँचे। दिन भर चलने के कारण वे अत्यंत थक चुके थे। संध्या का समय हो चला था और उन्हें रात्रि विश्राम के लिए किसी पवित्र परिवार की आवश्यकता थी। उन्होंने गाँव के लोगों से विनम्रता से पूछा, “भाइयो, क्या यहाँ कोई ऐसा घर है जहाँ हम एक रात्रि विश्राम कर सकें?”

गाँव वालों ने बताया, “यहाँ एक वृद्ध चाचा का घर है। वे साधु-संतों की बड़ी श्रद्धा से सेवा करते हैं। आप वहाँ चले जाइए, वे आपको अवश्य ठहराएँगे।”

दोनों संन्यासी बताए गए घर पर पहुँचे। वृद्ध चाचा ने उन्हें देखते ही आदरपूर्वक प्रणाम किया और बड़े प्रेम से भीतर बुलाया। उन्होंने उनके चरण धोए, सादा किंतु स्वादिष्ट भोजन कराया और विश्राम के लिए स्वच्छ बिछौना भी लगा दिया। वृद्ध का व्यवहार अत्यंत विनम्र और सेवा-भाव से भरा हुआ था।

रात्रि में भोजन के पश्चात कथा-वार्ता प्रारंभ हुई। एक संन्यासी ने उत्सुकता से पूछा, “चाचा, आपने अब तक कितने तीर्थों का दर्शन किया है? कितनी बार चारों धाम की यात्रा की है?”

वृद्ध मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “बेटा, मैंने तो आज तक एक भी तीर्थ का दर्शन नहीं किया। मैं यहीं रहकर भगवान का स्मरण करता हूँ और जब आप जैसे संत आते हैं, तो सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त कर लेता हूँ।”

यह सुनकर दोनों संन्यासी मन ही मन विचलित हो उठे। वे सोचने लगे, “जिसने एक भी तीर्थ नहीं किया, उसके यहाँ हमने भोजन कर लिया! यह तो अनुचित हो गया।” उनके मन में संदेह और अहंकार की हलचल उठने लगी।

रात्रि बीतने लगी, परंतु उनके मन को शांति नहीं मिली। वे करवटें बदलते रहे। आधी रात के समय अचानक उनकी दृष्टि आँगन की ओर पड़ी। उन्होंने देखा कि गोबर से लीपे हुए आँगन में एक काली गाय आई और वहाँ लोटने लगी। आश्चर्य की बात यह थी कि जैसे ही वह लोटकर उठी, उसका शरीर काले से सफेद हो गया और वह अदृश्य हो गई।

कुछ ही क्षणों में दूसरी, तीसरी और फिर अनेक काली गायें आईं। प्रत्येक गाय उसी प्रकार लोटती और श्वेत होकर विलीन हो जाती। यह अद्भुत दृश्य देखकर दोनों संन्यासी विस्मित रह गए।

अंत में जब एक गाय जाने लगी, तो उन्होंने साहस करके उसे प्रणाम किया और पूछा, “हे गौ माता! यह अद्भुत रहस्य क्या है? आप यहाँ आकर श्वेत कैसे हो जाती हैं?”

गाय ने मधुर स्वर में उत्तर दिया, “हम सभी तीर्थों का स्वरूप हैं। मनुष्य हमारे जल में स्नान करके अपने पापों को धोते हैं, और उन पापों की कालिमा हम पर चढ़ जाती है। उस कालिमा को मिटाने के लिए हम ऐसे संत पुरुषों के आँगन में आती हैं, जो आत्मज्ञान में स्थित और निष्कपट होते हैं। इस घर के वृद्ध ऐसे ही महापुरुष हैं, जिनकी पवित्रता से हम पुनः शुद्ध हो जाती हैं।”

यह सुनकर दोनों संन्यासियों का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने समझ लिया कि सच्चा तीर्थ बाहर नहीं, बल्कि पवित्र हृदय और सेवा-भाव में बसता है।

प्रातःकाल उन्होंने वृद्ध के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। वृद्ध ने स्नेहपूर्वक उन्हें उठाया और कहा, “बेटा, सच्ची भक्ति बाहरी यात्राओं से नहीं, बल्कि निर्मल मन और सेवा से प्राप्त होती है।”

मनुष्य प्रायः बाहरी आडंबर और दिखावे में सच्चे धर्म को खोजता है, जबकि वास्तविक तीर्थ तो सद्गुणों, सेवा और शुद्ध हृदय में निवास करता है। जिस मन में श्रद्धा, करुणा और विश्वास हो, वही स्थान सच्चा तीर्थ बन जाता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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