” एक शरारत की कीमत “

एक छोटे से कस्बे में एक गरीब वृद्ध महिला रहती थी। उसकी आँखों की रोशनी बहुत कम हो चुकी थी, इसलिए उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था। वह रोज़ भिक्षा माँगकर किसी तरह अपना गुज़ारा करती थी। लोग उसे दया से कुछ न कुछ दे देते, और उसी से उसका जीवन चल रहा था।

एक दिन अचानक उसकी तबीयत बहुत खराब हो गई। तेज़ बुखार और कमजोरी के कारण वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उसी समय एक दयालु व्यक्ति ने उसकी हालत देखकर दया खाई और उसे 500 रुपये का एक नोट देते हुए कहा,
“माई, इससे दवा खरीद लेना, भगवान तुम्हें जल्दी ठीक करे।”

वृद्धा की आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए। उसने उस व्यक्ति को ढेरों आशीर्वाद दिए और धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल पड़ी।

शाम ढलने लगी थी और अंधेरा बढ़ता जा रहा था। रास्ते में एक सुनसान जगह पर दो युवक शराब पीकर ऊधम मचा रहे थे। जैसे ही वृद्धा वहाँ से गुज़री, उनकी नज़र उसके भिक्षापात्र पर पड़ी। उसमें रखा 500 रुपये का नोट देखकर उनमें से एक के मन में शरारत सूझी।

वह हँसते हुए बोला,
“देखते हैं, इसे पता भी चलता है या नहीं।”

और उसने चुपके से वह नोट निकालकर अपनी जेब में रख लिया।

वृद्धा को हल्का-सा आभास तो हुआ कि कुछ गड़बड़ हुई है, पर वह असहाय थी। उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप अपने घर की ओर बढ़ गई।

रात गहराती गई, और उसकी तबीयत और बिगड़ती चली गई। बिना दवा के वह पूरी रात तड़पती रही।

उधर सुबह जब दोनों युवकों का नशा उतरा, तो उन्हें अपनी हरकत याद आई। अब उनकी हँसी गायब हो चुकी थी और चेहरे पर पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।

एक युवक बोला,
“हमने बहुत गलत किया… चलो आज शाम को उस माई को पैसे वापस कर देते हैं।”

दोनों ने तय किया कि शाम को उसी जगह उसका इंतज़ार करेंगे।

लेकिन उस दिन शाम तक वृद्धा वहाँ नहीं आई।
उन्हें चिंता हुई। उन्होंने लोगों से पूछताछ की और किसी तरह उसका घर ढूँढते हुए वहाँ पहुँच गए।

घर के बाहर कुछ लोग खड़े थे और माहौल बहुत उदास था। उन्होंने एक व्यक्ति से पूछा,
“बाबा, यहाँ रहने वाली बूढ़ी माई कहाँ है?”

उस व्यक्ति ने भारी आवाज़ में कहा,
“रात उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई थी… दवा न मिलने के कारण वह चल बसी।”

यह सुनते ही दोनों युवक स्तब्ध रह गए। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके दिल पर भारी पत्थर रख दिया हो।

अब उन्हें समझ में आ गया था कि उनकी एक छोटी-सी शरारत किसी की जान की कीमत बन गई थी।

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। अपराधबोध और आत्मग्लानि ने उनके मन को झकझोर दिया। उसी क्षण उन्होंने कसम खाई कि वे आज के बाद कभी शराब नहीं पिएँगे और न ही किसी के साथ मज़ाक या शरारत करेंगे जिससे किसी को नुकसान पहुँचे।

समय बीतता गया। उनके व्यवहार में आए अचानक बदलाव को देखकर उनके माता-पिता भी हैरान थे। जब उन्हें पूरी घटना का पता चला, तो वे भी दुखी हो उठे।

उन्होंने अपने बेटों से कहा,
“बेटा, गलती हो गई है, लेकिन अब उसका सच्चा प्रायश्चित यही है कि तुम जीवन भर अच्छे रास्ते पर चलो और जब भी किसी दीन-दुखी को देखो, उसकी मदद करने से पीछे मत हटो।”

उस दिन के बाद दोनों युवक सचमुच बदल गए। वे जरूरतमंद लोगों की मदद करने लगे और हर उस वृद्धा में उन्हें अपनी गलती की याद दिखाई देती, जिसने उन्हें जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाया था।

कभी-कभी हमारी छोटी-सी शरारत भी किसी के लिए बहुत बड़ा नुकसान बन सकती है। इसलिए हमेशा सोच-समझकर काम करें और जरूरतमंदों की मदद करने का अवसर कभी न छोड़ें।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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