एक बार की बात है, एक माँ के गर्भ में दो शिशु पल रहे थे। दोनों धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे और समय के साथ उनमें सोचने-समझने की क्षमता भी आने लगी थी। एक दिन पहले शिशु ने दूसरे से पूछा, “क्या तुम्हें लगता है कि इस दुनिया के बाहर भी कोई जीवन है? क्या जन्म के बाद भी कोई नई दुनिया होती है?”
दूसरे शिशु ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हाँ, मुझे पूरा विश्वास है कि यहाँ के बाद भी एक जीवन है। शायद हम यहाँ जो बन रहे हैं, वह बाहर की दुनिया के लिए तैयारी है। हो सकता है, बाहर जाकर हम इन पैरों से चलें, इन हाथों से काम करें और इस मुँह से भोजन करें।”
पहला शिशु हँसते हुए बोला, “तुम कितनी अजीब बातें करते हो! यहाँ से बाहर कोई जीवन नहीं हो सकता। बाहर सिर्फ अंधकार होगा। और तुम कह रहे हो कि हम मुँह से खाएँगे? यह कैसे संभव है? हम तो इस नाल (umbilical cord) के सहारे ही भोजन पा रहे हैं। यह नाल इतनी छोटी है कि बाहर हमारे साथ नहीं जा सकती। जब भोजन ही नहीं मिलेगा, तो जीवन कैसे रहेगा? बाहर केवल अंत है, कोई शुरुआत नहीं।”
दूसरे शिशु ने धैर्य से कहा, “हो सकता है वहाँ भोजन पाने का तरीका अलग हो। शायद कोई ऐसी शक्ति हो जो हमारा ध्यान रखे। मुझे लगता है कि कोई ‘माँ’ है, जो हमें यहाँ भी संभाल रही है और बाहर भी हमारा ख्याल रखेगी।”
पहला शिशु थोड़ा चिढ़कर बोला, “माँ? यह माँ क्या होती है? अगर माँ जैसी कोई चीज़ होती, तो हमें अब तक दिखाई क्यों नहीं दी? जब हम डरते हैं या बेचैन होते हैं, तब वह सामने क्यों नहीं आती? जिसे हम देख नहीं सकते, उसे कैसे मान लें? और अगर बाहर सचमुच कोई दुनिया होती, तो वहाँ से कोई वापस क्यों नहीं आया? मेरे अनुसार जन्म का अर्थ ही अंत है।”
दूसरे शिशु ने बहुत शांति से उत्तर दिया, “हो सकता है माँ हमारे चारों ओर ही हो और हम उसी के भीतर हों। अभी हम उसे देख नहीं सकते, पर उसकी उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं। जब तुम शांत होकर ध्यान से सुनोगे, तो तुम्हें उसकी धड़कन सुनाई देगी। जब तुम्हारा मन स्थिर होगा, तब तुम्हें एहसास होगा कि कोई हमें प्रेम से संभाल रहा है। जिस दिन हमारा अहंकार समाप्त होगा और मन शांत होगा, उसी दिन हमें उसकी उपस्थिति का अनुभव होगा।”
समय बीतता गया और जन्म का क्षण निकट आया। उस क्षण, जब दोनों शिशु इस दुनिया में आए, तो दूसरे शिशु की बात सच साबित हुई। बाहर वास्तव में एक नई दुनिया थी—प्रकाश से भरी, प्रेम से भरी—जहाँ उनकी माँ ने उन्हें अपनी बाहों में लेकर स्नेह से सहलाया। तब पहले शिशु को समझ आया कि हर वह चीज़, जो आँखों से दिखाई नहीं देती, वह झूठ नहीं होती। कुछ सत्य अनुभव से ही समझ में आते हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि हर सत्य को केवल आँखों से नहीं देखा जा सकता। कई बार विश्वास, धैर्य और शांत मन से ही हम अदृश्य शक्तियों और जीवन के गहरे रहस्यों को समझ पाते हैं। इसलिए जीवन में हर चीज़ को केवल तर्क से नहीं, बल्कि विश्वास और सकारात्मक सोच से भी समझना चाहिए।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
