” समझदारी का सच्चा निर्णय “

राशि का विवाह हुए अभी एक ही दिन हुआ था। उसने अपने नए जीवन को लेकर अनेक सुंदर सपने संजोए थे, परंतु विवाह के अगले ही दिन सुबह उसकी कल्पनाएँ टूटने लगीं। सासू माँ ने उठते ही उसे कठोर स्वर में कहा कि कल से सुबह जल्दी उठा करे। राशि ने मन ही मन सोचा कि यदि यही बात थोड़ा स्नेहपूर्वक कही जाती तो उसे अच्छा लगता। धीरे-धीरे कुछ दिन बीते और उसे समझ में आने लगा कि उसका पति मनोज स्वभाव से बहुत अच्छा और प्रेम करने वाला है, परंतु उसे पति के साथ दो पल बैठने का अवसर भी नहीं मिल पाता था। सासू माँ दिनभर उसे तरह-तरह के कार्यों में लगाए रखतीं और बात-बात पर ताने देतीं—कभी बेटे के लिए विशेष व्यंजन बनाने को कहतीं, कभी महंगे कपड़े हाथ से धुलवातीं और कभी उसके कामों में कमियाँ निकालतीं।

मनोज सब कुछ देखता था, परंतु मौन रहता था। वह अपनी माँ और पत्नी के बीच फँस गया था। यदि माँ से कुछ कहता तो उनके मन को ठेस पहुँचती और यदि पत्नी का साथ देता तो घर का वातावरण और बिगड़ जाता। मनोज के पिता भी इस विषय में कभी हस्तक्षेप नहीं करते थे। परिणामस्वरूप राशि का मन दिन-प्रतिदिन बुझता चला गया। वह मनोज से बहुत प्रेम करती थी, परंतु लगातार मिल रहे उपेक्षा और तानों के कारण उसके मन में कड़वाहट भरने लगी। वह अक्सर सोचती कि काश मनोज कभी तो उसका साथ देता।

डेढ़ वर्ष बाद राशि और मनोज के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण था, परंतु सासू माँ का व्यवहार पहले जैसा ही बना रहा। घर, बच्चे और काम की जिम्मेदारियों के बीच राशि थककर चूर हो जाती। उसका शरीर कमजोर होता जा रहा था और मन चिड़चिड़ा हो गया था। उसने कई बार मनोज से घर के कामों के लिए एक नौकरानी रखने की बात कही, परंतु सासू माँ ने इसे सिरे से अस्वीकार कर दिया।

एक दिन मनोज ने घर आकर बताया कि उसे कार्यालय की ओर से एक नई कार्यस्थली मिली है, जो घर से बहुत दूर है। यह सुनकर सभी चिंतित हो गए। मनोज के पिता ने सुझाव दिया कि मनोज और राशि वहीं पास में एक नया घर लेकर रहने लगें। यह सुनते ही राशि की आँखों में आशा की किरण जाग उठी, परंतु सासू माँ को यह विचार बिल्कुल पसंद नहीं आया। अंततः बेटे की कठिनाई को देखते हुए उन्होंने अनुमति दे दी।

कुछ ही दिनों में मनोज और राशि नए घर में रहने चले गए। अगले दिन सुबह राशि जल्दी उठी, ताकि अपनी पसंद का भोजन बनाकर मनोज को दे सके। तभी उसने देखा कि मनोज पहले की तरह जल्दी तैयार हो रहा है। उसने आश्चर्य से पूछा कि अब तो कार्यालय पास है, फिर इतनी जल्दी क्यों? तब मनोज मुस्कुराते हुए बोला कि कार्यालय पहले जितना ही दूर है; उसने यह सब केवल राशि की खुशी के लिए किया है। वह बोला कि यदि वह सीधे माँ से अलग रहने की बात करता, तो उन्हें बहुत दुख होता। इसलिए उसने ऐसा उपाय किया, जिससे किसी का मन न टूटे और राशि को भी सुख मिल सके।

मनोज ने बताया कि उसने नए घर का सारा सामान अपने पैसों से लिया है और अब एक नौकरानी भी आने वाली है, जिससे राशि को आराम मिल सके। यह सुनकर राशि की आँखें नम हो गईं। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मनोज ने उसके सुख के लिए इतना बड़ा निर्णय लिया है।

यह कहानी हमें सिखाती है कि समझदारी और धैर्य से लिया गया निर्णय परिवार में सुख और संतुलन ला सकता है। जीवन में कई बार परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जहाँ सीधा विरोध करने के बजाय बुद्धिमानी से समाधान निकालना अधिक उचित होता है। रिश्तों में प्रेम, त्याग और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान ही सच्ची खुशियों का आधार होता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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