महर्षि वेदव्यास एक दिन वन पथ पर विचरण कर रहे थे।
उनकी दृष्टि अचानक एक छोटे से कीड़े पर पड़ी, जो अपनी पूरी शक्ति लगाकर तेज़ी से भाग रहा था।
महर्षि ने करुण स्वर में पूछा—
“हे क्षुद्र जंतु! तुम इतनी व्याकुलता में कहाँ जा रहे हो?”
यह सुनकर कीड़ा ठिठक गया।
प्रश्न नहीं, शब्दों में छिपा ‘क्षुद्र’ का भाव उसके भीतर चुभ गया।
वह बोला—
“हे महर्षि! आप इतने ज्ञानी हैं, फिर भी एक प्रश्न पूछने की अनुमति दीजिए—
यहाँ वास्तव में क्षुद्र कौन है… और महान कौन?”
कीड़े का उत्तर सुनकर महर्षि क्षणभर को निरुत्तर हो गए।
फिर उन्होंने संयमित होकर पूछा—
“अच्छा, यह बताओ… तुम इतनी तेज़ी से क्यों भाग रहे हो?”
कीड़े ने पीछे की ओर संकेत किया—
“क्या आप नहीं देख रहे, पीछे से बैलगाड़ी आ रही है।
मैं अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा हूँ।”
महर्षि चौंक पड़े।
उन्होंने कहा—
“तुम तो कीट जीवन में हो।
यदि मर भी गए, तो अगले जन्म में शायद इससे श्रेष्ठ शरीर पा जाओगे।”
कीड़ा मुस्कराया—
“महर्षि… मैं कीट योनि में रहकर कीड़े का ही धर्म निभा रहा हूँ।
परंतु इस संसार में असंख्य ऐसे प्राणी हैं,
जिन्हें विधाता ने मनुष्य शरीर दिया है,
फिर भी उनका आचरण मुझसे भी गया-गुज़रा है।
मैं ज्ञान नहीं पा सकता,
पर मनुष्य को तो सोचने, समझने और उठने की क्षमता मिली है।
फिर भी वह देहासक्ति, लोभ और अहंकार में
कीड़ों से भी नीचे गिर जाता है।”
कीड़े के शब्द तीर की तरह महर्षि के हृदय में उतर गए।
वे गहरे चिंतन में डूब गए।
उन्होंने महसूस किया—
जो मनुष्य होकर भी
ज्ञान से विमुख है,
कर्तव्य से पलायन करता है,
और केवल भोग में उलझा है—
वह वास्तव में क्षुद्र है,
चाहे उसका शरीर कितना ही महान क्यों न हो।
करुणा से भरकर महर्षि बोले—
“नन्हें जीव, आओ…
मैं तुम्हें इस बैलगाड़ी से सुरक्षित दूर पहुँचा देता हूँ।”
कीड़ा हाथ जोड़कर बोला—
“मुनिवर,
पराश्रित और श्रमरहित जीवन
विकास के द्वार बंद कर देता है।
मुझे अपने पुरुषार्थ से ही बचने दीजिए।”
यह सुनते ही
महर्षि वेदव्यास को ज्ञान का नया प्रकाश प्राप्त हुआ।
उन्होंने जाना— महानता शरीर से नहीं, आचरण से आती है।
जो प्राप्त है, वही पर्याप्त मान लेने वाला
और जिसका मन संतुष्ट है—
वही वास्तव में समस्त का स्वामी है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
