” माँ ममता की देवी “

“नानी, मैं एक कुल्फी और ले लूँ, प्लीज़…”
चीकू ने फ्रिज खोलते हुए पूछा।

“चीकू, तुम खा चुके हो न?.. ग़लत बात है, वह कुल्फी नानी की है… हटो वहाँ से…”
मैंने अपने छह साल के बेटे को आँखें तरेरीं, लेकिन तब तक चीकू की नानी कुल्फी उसके हाथ में थमा चुकी थीं।

“क्या माँ… मैं ख़ास आपके लिए रघुवीर जी वाली कुल्फी लाई थी… यह तो खा चुका था न।”

“अरे बेटा, जब से घुटनों में दर्द बढ़ गया है न, डॉक्टर ने ठंडी चीज़ें खाने से मना कर दिया है।”

मैंने सिर पकड़ लिया। माँ की वही पुरानी बीमारी—झूठ बोलने की।
बचपन से ही ऐसा होता आया है। बस माँ को यह पता चल जाए कि हमें क्या अच्छा लगा, तो अपने हिस्से की चीज़ देने के लिए कोई न कोई कमी निकाल ही लेती हैं। इतना बुरा बता देती हैं कि सामने वाला मजबूर होकर वही चीज़ ले ले।

“माँ, मटर-पनीर और है क्या? बहुत अच्छी बनी है!”

“हाँ, मेरी कटोरी से ले लो, मुझसे तो खाई ही नहीं जा रही… मिर्च बहुत है।”

एक बार पापा कितने मन से गुलाबी कढ़ाई वाला शॉल लाए थे। बड़ी बुआ को बहुत भा गया, और माँ का फिर वही नाटक—

“अरे, रख लो जीजी… मुझे तो इसका रंग ही बड़ा ख़राब लगता है।”

उसके बाद दो दिनों तक मैंने माँ से बात नहीं की थी।
पापा ने समझाया था,
“बेटा, तुम्हारी माँ ने कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहा, ऐसी ही है वह।”

चीकू की छुट्टियाँ खत्म होने वाली थीं। एक-दो दिन में वापस जाना था। मन अजीब सा हो रहा था।
शाम को कुछ साड़ियाँ खरीदीं। उनमें से हरी बंधेज की साड़ी माँ को बहुत पसंद आई। बार-बार उलट-पलट कर देखती रहीं।

“माँ, यह आप रख लीजिए… मैं दूसरी ले लूँगी।”

“अरे नहीं रे, यह हरा रंग? ना बाबा, बहुत चटक है।”

सुबह निकलना था। सारी पैकिंग हो चुकी थी। मैं परेशान थी।

“क्या हुआ बेटा, क्या ढूँढ रही हो?” माँ ने पूछा।

“कुछ नहीं माँ, वह रसीद नहीं मिल रही… बिना रसीद साड़ी वापस नहीं होगी।”
मैंने पर्स टटोलते हुए कहा।

“लेकिन वापस क्यों करनी है? तुम तो अपनी पसंद से लाई थीं।”

“हाँ माँ, लेकिन चीकू के पापा को हरी वाली बिल्कुल पसंद नहीं आई। फोटो भेजी थी, बोले तुरंत वापस करो… लेकिन बिना रसीद?”

“अगर वापस ही करनी है तो… मैं रख लेती हूँ।”
माँ साड़ी लेकर अंदर चली गईं।

दरवाज़े पर पापा खड़े मुस्कुरा रहे थे। मेरी चोरी पकड़ी जा चुकी थी।

“लग गई माँ की बीमारी तुम्हें भी?”
पापा ने सिर पर हाथ फेरा,
“सदा खुश रहो!”

मैं भी यही सोच रही थी—
माँ को उनकी पसंद की चीज़ देने के लिए मुझे उन्हीं का तरीका अपनाना पड़ा, और वह कारगर भी हुआ।

आज यह भी समझ में आया कि माँ ऐसा क्यों करती हैं।
जब कोई अपना हमारी चीज़ लेता है, तो जो सुकून मिलता है, वह ऐसा होता है जैसे वह चीज़ हम खुद ही इस्तेमाल कर रहे हों—बल्कि उससे भी ज़्यादा।

अब मुझे बस इंतज़ार था, माँ को वह साड़ी पहने हुए देखने का… ।।

 

  •  राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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