पुराना कस्बा था—शांत, मगर रहस्यों से भरा। लोग कहते थे कि यहाँ रात के सन्नाटे में भगवान की मर्जी खुद बोलती है। उसी कस्बे में रहता था राघव—मेहनती, समझदार, लेकिन भीतर से बेहद बेचैन। उसे हमेशा लगता था कि भगवान ने उसके हिस्से में कम ही लिखा है। दूसरों की चमकती ज़िंदगी देखकर उसका मन बार-बार डगमगा जाता।
एक रात राघव को खबर मिली कि कस्बे के बाहर पुराने पहाड़ में कोई खज़ाना छिपा है। कहा जाता था कि जो भी उसे ढूंढ ले, उसकी तक़दीर बदल जाती है। राघव के दिल में हलचल मच गई—“अगर भगवान सच में सबको जीवन देता है, तो मुझे यह मौका क्यों न मिले?”
अगली ही रात वह लालटेन लेकर पहाड़ की ओर निकल पड़ा। हवा अजीब तरह से सिसक रही थी, जैसे कोई चेतावनी दे रही हो। रास्ते में उसे एक बूढ़ा साधु मिला, जिसने कहा,
“बेटा, जो तुझे मिलना है, वह पहले से लिखा है।”
राघव ने हँसकर बात टाल दी—“अगर सब लिखा है, तो कोशिश क्यों न करूँ?”
पहाड़ के भीतर एक गुफा थी। जैसे ही वह अंदर घुसा, दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया। अँधेरा, ठंड और अजीब-सी खामोशी। तभी दीवार पर उकेरे शब्द चमक उठे—
“लालच छोड़, भरोसा रख।”
राघव घबरा गया। तभी ज़मीन हिली और एक पत्थर खिसक गया। उसके नीचे सोने-चाँदी की झलक दिखी। दिल तेज़ धड़कने लगा। उसने जैसे ही हाथ बढ़ाया, गुफा में तेज़ आवाज़ गूँजी—
“उतना ही ले, जितना तेरा है।”
डरते-डरते उसने थोड़े सिक्के उठाए। उसी पल दरवाज़ा खुल गया। बाहर निकलते ही सूरज उग आया, मानो सब कुछ सपना हो। घर पहुँचकर जब उसने सिक्के देखे, वे साधारण पत्थर बन चुके थे। राघव को गहरा झटका लगा—क्या यह सब भ्रम था?
कुछ दिनों बाद कस्बे में भयंकर सूखा पड़ गया। लोग परेशान थे। राघव ने अपनी थोड़ी-सी जमा पूँजी से गाँव के लिए कुआँ खुदवाने में मदद की। आश्चर्य! उसी जगह पानी फूट पड़ा। कस्बे की ज़िंदगी फिर से हरी हो गई। लोगों का प्रेम और सम्मान राघव को मिला—वह सम्मान जो सोने से कहीं बड़ा था।
एक शाम वही बूढ़ा साधु फिर मिला। मुस्कराकर बोला,
“देखा बेटा? भगवान जीवन हर किसी को देते हैं—कभी पत्थर में कीड़े को, तो कभी इंसान को भरोसे में।”
राघव की आँखें नम हो गईं। उसे समझ आ गया कि हीरे-मोती के चक्कर में वह असली खज़ाना भूल गया था—विश्वास, सेवा और संतोष। उस रात उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,
“भगवान, अब मैं जान गया हूँ—मुझे उतना ही मिलेगा, जितना मेरे मुक़द्दर में है… और वही मेरे लिए सबसे सही है।”
लालच और तुलना मन को अंधा कर देती है। भगवान पर भरोसा रखो—जो लिखा है, वही मिलेगा, और समय आने पर सबसे सही रूप में मिलेगा !
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
