किसी नगर में एक सेठ जी रहते थे। उनके घर के पास ही एक मंदिर था।
एक रात्रि को मंदिर में चल रहे एक भक्त के कीर्तन की ध्वनि के कारण सेठ जी को ठीक से नींद नहीं आई।
सुबह होते ही सेठ जी ने उस भक्त को बुलाकर खूब डाँटा—
सेठजी बोले, “यह सब क्या उपद्रव मचा रखा है?”
भक्त ने विनम्रता से कहा—
“सेठजी, आज एकादशी का जागरण-कीर्तन चल रहा था।”
सेठ जी नाराज़ होकर बोले—
“तो क्या जागरण-कीर्तन के नाम पर हमारी नींद हराम कर दोगे? आदमी अच्छी नींद लेता है, तभी काम करता है, कमाता है और तब खाता है।”
भक्त शांत स्वर में बोला—
“सेठजी, कमाने वाला तो आप हैं, पर खिलाने वाला तो वही है।”
सेठ जी हँसते हुए बोले—
“कौन खिलाता है? क्या तुम्हारा भगवान आकर खिलाता है?”
भक्त बोला—
“हाँ सेठजी, वही खिलाता है।”
सेठ जी ने कहा—
“हम कमाते हैं, तब खाते हैं। भगवान के भरोसे तो कोई पेट नहीं भरता।”
भक्त ने उत्तर दिया—
“आपका कमाना निमित्त है, पत्नी का रोटी बनाना निमित्त है, पर सबका पालन-पोषण करने वाला तो वही जगन्नाथ है।”
सेठ जी चिढ़कर बोले—
“क्या पालनहार-पालनहार लगा रखा है! क्या वह एक-एक के मुँह में निवाला डालने आता है?”
भक्त बोला—
“हाँ सेठजी, वही सबको खिलाता है।”
सेठ जी बोले—
“हम उसका दिया नहीं खाते।”
भक्त मुस्कराकर बोला—
“नहीं खाओगे तो मारकर भी खिलाता है।”
सेठ जी ने चुनौती दे दी—
“अगर तुम्हारा भगवान मुझे चौबीस घंटों में नहीं खिला पाया, तो तुम यह भजन-कीर्तन हमेशा के लिए बंद कर दोगे।”
भक्त ने दृढ़ विश्वास से कहा—
“सेठजी, आपकी पहुँच बहुत ऊपर तक होगी, पर उसके हाथ उससे भी बड़े हैं। जब तक उसकी इच्छा न हो, किसी का बाल भी बाँका नहीं हो सकता। आज़माकर देख लीजिए।”
सेठ जी भक्त की निष्ठा परखने के लिए घने जंगल में चले गए और एक विशाल वृक्ष की ऊँची डाल पर बैठ गए।
मन-ही-मन सोचने लगे—
“अब देखता हूँ कौन आता है मुझे खिलाने!”
कुछ देर बाद एक अजनबी व्यक्ति वहाँ आया, पेड़ के नीचे थोड़ी देर आराम किया और जाते-जाते अपना एक थैला वहीं भूल गया।
कुछ समय बाद पाँच डकैत वहाँ पहुँचे।
उनमें से एक बोला—
“उस्ताद! यहाँ एक थैला पड़ा है।”
थैला खोलकर देखा तो उसमें गरमा-गरम भोजन से भरा टिफिन था।
एक बोला—
“भूख लगी है, लगता है भगवान ने ही भेजा है।”
सरदार बोला—
“चुप! यह किसी का जाल हो सकता है, ज़हर मिला हो या पुलिस की चाल।”
उन्होंने चारों ओर देखा। कोई दिखाई नहीं दिया।
तभी सरदार ने ज़ोर से आवाज़ लगाई—
“अगर कोई है, तो बताए यह थैला किसने छोड़ा है?”
ऊपर पेड़ पर बैठे सेठ जी घबरा गए, पर चुप रहे।
लेकिन जो सबके हृदय की धड़कन चलाता है, वह अपने भक्त का वचन पूरा किए बिना शांत नहीं रहता।
उसकी प्रेरणा से डकैतों ने ऊपर देखा।
“अरे! डाल पर आदमी बैठा है। नीचे उतर!”
सेठ जी बोले—
“मैं नहीं उतरूँगा।”
डकैत बोले—
“यही खाना तूने रखा होगा। नीचे उतर और खा!”
सेठ जी ने मना किया, पर डकैतों ने उन्हें ज़बरदस्ती नीचे उतारा और मार-पीट कर भोजन खिलाने लगे।
तभी सेठ जी को भक्त की बात याद आ गई—
“नहीं खाओगे तो मारकर भी खिलाता है।”
आख़िर डर के मारे सेठ जी ने खाना खा लिया और मन-ही-मन बोले—
“मान गया प्रभु! तू सच में मारकर भी खिलाता है।”
डकैत चले गए।
सेठ जी सीधे भक्त के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले—
“आपकी बात सत्य निकली। जो पालनहार है, वही सबको खिलाता है।”
उस दिन सेठ जी के हृदय में भक्ति की धारा बह निकली।
सत्य यही है कि परमात्मा ही जगत की व्यवस्था का कुशल संचालन करते हैं।
उस पर केवल विश्वास नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास होना चाहिए।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
