घर के आँगन में दोपहर की धूप फैली थी। रसोई में माँ बर्तन माँज रही थी, तभी बेटा स्कूल बैग टाँगे आकर बोला,
“मम्मी, 50 रुपये चाहिए… कॉपी लेनी है।”
माँ ने बिना पीछे मुड़े मुस्कुराते हुए कहा, “जा बेटा, पापा की जेब से निकाल ले।”
यह सुनकर पास ही खड़ी पड़ोसन ठिठक गई। उसके चेहरे पर हैरानी साफ थी। उसने धीरे से पूछा,
“बहन, तुम्हारे पति को तो गुज़रे पाँच साल हो गए… फिर बच्चों का पापा किसे बनाया है?”
माँ कुछ पल चुप रही। उसकी उँगलियाँ बर्तनों पर थम गईं। फिर वह बेटे का हाथ पकड़कर कमरे में ले गई। दीवार पर टँगी एक पुरानी खूँटी से एक शर्ट उतारी—वही शर्ट जिसे उसका पति रोज़ दफ्तर जाते समय पहनता था। शर्ट की जेब में उसने हाथ डाला और कुछ सिक्कों के साथ एक मुड़ा हुआ नोट निकालकर बेटे को थमा दिया।
पड़ोसन अवाक् देखती रह गई।
माँ ने शांत स्वर में कहा, “मैं हर महीने थोड़े-थोड़े पैसे इस शर्ट की जेब में रख देती हूँ। ताकि मेरे बच्चे कभी यह न भूलें कि उनके पापा अब भी उनके साथ हैं।”
उसकी आँखें नम थीं, पर आवाज़ में मजबूती थी।
“पापा इस दुनिया में नहीं हैं, तो क्या हुआ? वे हमारी यादों में, हमारी मेहनत में, हमारी ताक़त में आज भी ज़िंदा हैं। जब बच्चे कहते हैं—‘पापा की जेब से पैसे ले आए’—तो मुझे लगता है, वे आज भी घर चला रहे हैं।”
बेटा पैसे लेकर बाहर गया, जैसे कुछ खास हुआ ही न हो। माँ ने शर्ट को फिर से खूँटी पर टाँग दिया। वह शर्ट सिर्फ कपड़ा नहीं थी—वह भरोसा थी, सहारा थी, एक अदृश्य हाथ जो मुश्किल वक्त में थाम लेता है।
पड़ोसन की आँखें भर आईं। उसे समझ आ गया कि पिता सिर्फ शरीर से होते हैं, यादों से नहीं मरते। जिन घरों में प्रेम और सम्मान होता है, वहाँ खाली जेबें भी भरी रहती हैं।
उस शाम माँ ने दीये के सामने हाथ जोड़कर कहा,
“तुम जहाँ भी हो, बच्चों को हिम्मत देना। वे जब भी पापा की जेब में हाथ डालें, उन्हें भरोसा मिले कि उनके पापा कभी खाली नहीं जाते।”
और सच ही तो है—जो पिता अपने बच्चों के दिलों में बस जाते हैं, उनकी जेबें कभी खाली नहीं होतीं।
- * राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
