लखनऊ: प्रदेश के मुख्य सचिव श्री एस.पी.गोयल की अध्यक्षता में चारा टास्क फोर्स की बैठक आयोजित की गई। बैठक में प्रदेश में चारे की उपलब्धता बढ़ाने और दीर्घकालिक समाधान विकसित करने पर विस्तार से चर्चा की गई।
मुख्य सचिव ने कहा कि प्रदेश में उपलब्ध गैर-कृषि भूमि एवं चारागाह भूमि का बेहतर उपयोग करते हुए चारा उत्पादन के तरीकों में व्यापक बदलाव लाकर चारे की कमी को दूर किया जा सकता है। उन्होंने विषय विशेषज्ञों, डेयरी, कृषि, उद्यान एवं संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर एक व्यवहारिक मॉडल तैयार करने के निर्देश दिए, जिससे प्रदेश में चारा उत्पादन को दोगुना किया जा सके। साथ ही ऊसर भूमि पर चारा उत्पादन के प्रयास करने पर भी जोर दिया गया, जिससे न केवल चारे की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि दुग्ध उत्पादन में भी वृद्धि होगी।
उन्होंने कहा कि हरे चारे के उत्पादन में किसानों को बेहतर आर्थिक रिटर्न प्राप्त होता है, इसलिए किसानों को इस संबंध में जागरूक किया जाए और चारा उत्पादन के लिए प्रेरित किया जाए। उन्होंने अधिक उत्पादन के लिए उन्नत बीजों एवं आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर बल दिया तथा जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों के चयन के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि किसानों को गुणवत्तायुक्त चारा बीज एवं रोपण सामग्री के महत्व से अवगत कराने, गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन और साइलेज निर्माण के लिए इच्छुक एफपीओ को चिन्हित कर उन्हें प्रोत्साहित किया जाए। बुंदेलखंड क्षेत्र में प्रत्येक जनपद में कम से कम दो-दो एफपीओ तथा अन्य जनपदों में एक-एक एफपीओ स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। इस कार्य में स्वयं सहायता समूहों का भी सहयोग लिया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने शाकभाजी एवं फल अवशेषों के चारे के रूप में उपयोग के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार करने तथा चारा उत्पादन के उपरांत उसके लिए प्रभावी मार्केट लिंकेज विकसित करने के निर्देश दिए।
बैठक में अवगत कराया गया कि प्रदेश में हरे चारे की पूर्ति के लिए विभिन्न संभावनाओं और नवाचारों पर निरंतर कार्य किया जा रहा है। अप्रयुक्त फसल अवशेषों जैसे गेहूं का भूसा, धान की पराली, मक्का एवं ज्वार-बाजरा के तनों के उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन अवशेषों को जलाने पर प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें भूसा, हे, साइलेज एवं कंप्रेस्ड फॉडर ब्लॉक के रूप में संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
चारा नवाचारों के अंतर्गत पेठा अवशेषों का चारे के रूप में उपयोग, हरी मटर के छिलकों से चारा अथवा साइलेज निर्माण, तथा सब्जी मंडियों से निकलने वाले पत्तों, जड़ों एवं अन्य अवशेषों को संरक्षित कर हरे चारे के रूप में प्रयोग किए जाने की योजनाओं पर कार्य हो रहा है। इसके अतिरिक्त गैर-परंपरागत चारे के रूप में मोरिंगा, कांटे-रहित कैक्टस का शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उपयोग, तथा सुमरबीट एवं लथाइरस (खेसारी) को हरे चारे के रूप में बढ़ावा देने पर भी चर्चा की गई। बैठक में इन सभी प्रयासों को प्रभावी ढंग से लागू कर प्रदेश में चारा उत्पादन और पशुपालन को सशक्त बनाने का संकल्प दोहराया गया।
बैठक में अपर मुख्य सचिव पशुधन श्री मुकेश कुमार मेश्राम, प्रमुख सचिव राजस्व श्रीमती अपर्णा यू, ग्राम्य विकास आयुक्त श्री गौरी शंकर प्रियदर्शी, विशेष सचिव पशुधन श्री देवेन्द्र कुमार पाण्डेय सहित संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारीगण तथा वीडियों कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से विषय विशेषज्ञ उपस्थित थे।
