किसी छोटी-सी बात पर पत्नी से तीखी नोकझोंक हो गई। गुस्से में वह बड़बड़ाता हुआ घर से बाहर निकल पड़ा। मन ही मन तय कर लिया—अब इस झगड़ालू औरत से बात नहीं करूँगा। उसे लगता था कि पत्नी हर समय शिकायत करती है, सुकून से जीने ही नहीं देती। ठंडी हवा के बीच वह पास के चाय-स्टॉल पर पहुँचा, चाय मंगाई और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया।
अचानक पास से आवाज़ आई—“इतनी सर्दी में बाहर चाय पी रहे हो?” उसने गर्दन घुमाई। बगल के स्टूल पर एक बुजुर्ग बैठे थे। उसने झुंझलाकर जवाब दिया—“आप भी तो इतनी सर्दी में बाहर हैं।”
बुजुर्ग हल्की मुस्कान के साथ बोले—“मैं तो अकेला हूँ बेटा, न कोई गृहस्थी, न कोई साथी। तुम तो शादीशुदा लगते हो।”
बस फिर क्या था, उसके दिल का गुबार फूट पड़ा। “पत्नी जीने नहीं देती। हर वक्त चिकचिक। घर में चैन नहीं, इसलिए बाहर भटकना पड़ता है।” गर्म चाय का घूँट भीतर गया और कड़वाहट शब्दों में बाहर आ गई।
बुजुर्ग की आँखें गहरी हो गईं। वे धीमे स्वर में बोले—“पत्नी जीने नहीं देती? बरखुरदार, ज़िंदगी ही पत्नी से होती है। आठ साल हो गए मेरी पत्नी को गए हुए। जब ज़िंदा थी, उसकी कद्र नहीं की। आज वह चली गई तो हर पल याद आती है। बड़ा घर है, धन-दौलत है, बच्चे अपने-अपने काम में व्यस्त हैं, लेकिन घर सूना है। उसके बिना सब बेजान हो गया। वही मेरे जीवन की धड़कन थी… मेरे घर की भी।”
यह कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आए। वह आदमी कुछ पल स्तब्ध बैठा रहा। उसने चाय वाले को पैसे दिए, बुजुर्ग को भरपूर नज़र से देखा और बिना एक मिनट गंवाए घर की ओर चल पड़ा।
घर के पास पहुँचा तो दूर से ही देखा—पत्नी दरवाज़े पर खड़ी थी, डबडबाई आँखों से रास्ता निहार रही थी। उसे देखते ही बोली—“कहाँ चले गए थे? जैकेट भी नहीं पहनी, ठंड लग जाएगी।”
वह मुस्कुराया—“तुम भी तो बिना स्वेटर के खड़ी हो।”
उस पल दोनों ने बिना शब्दों के एक-दूसरे का प्यार पढ़ लिया। छोटी-छोटी शिकायतें कहीं खो गईं, और रिश्ते की गर्माहट फिर से लौट आई।
जीवन में जो हमारे पास है, वही सबसे बड़ा धन है। अक्सर हम अपनों की मौजूदगी को हल्के में ले लेते हैं और उनकी कमी का एहसास तब होता है जब वे दूर हो जाते हैं। पति-पत्नी का रिश्ता तकरार से नहीं, समझ और कद्र से मजबूत होता है। जो आज प्राप्त है, वही पर्याप्त मानना सीख लें, क्योंकि संतुष्ट मन के पास ही वास्तव में सब कुछ होता है।
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
