आज के दौर में जब युवा तेज मुनाफा की दौड़ में शामिल हो रहे हैं वही दिल्ली में पढ़ाई कर चुका एक युवा उद्यमी अपनी जड़ों से जुड़कर खादी और हथकरघा को न केवल बचा रहा है बल्कि उसे रोजगार परक एवं आत्मनिर्भरता का माध्यम बना रहा है। यह कहानी नहीं हकीकत है।
माई खादी फाउंडेशन
संस्थापक धनेंद्र दीक्षित की जिन्होंने पिछले पांच वर्षों में खादी को एक सामाजिक आंदोलन का रूप दे दिया है। करीब 5 वर्ष पहले इन्होंने खादी कपड़े की वस्तु की स्थिति को करीब से देखा और बुनकरों कार्यक्रम की मेहनत के बावजूद रोजगार और सम्मान नहीं मिल पा रहा था यहीं से शुरू हुई माई फाउंडेशन की नई शुरुआत, जिसका उद्देश्य व्यापार नहीं बल्कि कारीगरों को साथ जुड़कर स्थाई रोजगार देना था ,अलग-अलग गांव के कई इलाकों में जाकर बुनकर विशेष कर महिला कामगारों को एक मंच पर लाने का काम आपने किया धीरे-धीरे खादी के संग्रह से लेकर डिजाइन सिलाई और बिक्री तक एक संगठन व्यवस्था तैयार की इसके परिणाम स्वरूप आज संस्था में 50 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। खादी स्टोर की स्थापना के बाद संस्था ने डिजिटल युग के साथ हाथ से हाथ मिलाते हुए ऑनलाइन वेबसाइट की शुरुआत की ,जहां अब आर्टीजन बेस्ट खादी फैब्रिक और सस्टेबल फैशन को देश भर में पहुंचा जा रहा है यह पहल न केवल स्थानीय कारीगरों की आमदनी बढ़ा रही है, बल्कि सस्टेनेबल और हैंडलूम फैशन को भी बढ़ावा दे रही है। दिल्ली जैसे महानगर में शिक्षा हासिल करने के बाद अपने क्षेत्र में युवाओं और महिलाओं को रोजगार देना आज के युवाओं प्रेरणा दायक है।
